April 3, 2010

ऑपरेशन ग्रीन हंट

बंदूक की सरकारी भाषा और आदिवासी
''यह नामकरण ही गलत है। इसे हंट नहीं कहा जाना चाहिए। आप किसका शिकार कर रहे हैं? उन इंसानों का जो वहां रह रहे हैं? यह एक दुष्चक्र है। नक्सलवादियों की प्रतिक्रिया हो या सरकार की, दोनों ही बेवकूफी भरी हैं। इस सबमें सिर्फ आदिवासी पिस रहा है। सभी प्रतिक्रियाएं पूरी तरह से बेतुकी हैं। सरकार इस बड़े इलाके में संपत्ति का मालिकाना हक देने के तरीकेखोज नहीं पा रही है।''
''नक्सलवाद का सामना कई तरीकों से किया जा रहा है। नक्सलवाद पर पहली कार्रवाई हमेशा पुलिस स्टेशन से ही होती है। यदि पहली कार्रवाई करने वाला ही कमजोर हो, पर्याप्त मानव संसाधन हों, हथियार हों, तो आप कार्रवाई कैसे करेंगे? इन स्थितियों में पुलिसकर्मी सिर्फ मर सकते हैं।''
''जब तक भ्रष्टाचार का बोलबाला रहेगा, उचित कार्रवाई नहीं हो सकती। एक ईमानदार प्रतिक्रिया अहम होती है। राज्य और उसके नेतृत्व में इसके लिए जरूरी मानसिक क्षमता या जमीनी हालात की समझ का अभाव है। यहां नीचे से ऊपर तक हर कोई झूठ बोल रहा है।''
''किसी ऑपरेशन को अंजाम देने का यह कोई तरीका नहीं है। ऑपरेशन ग्रीन हंट बुरी तरह से असफल साबित होगा। एक बार जब कोई ऑपरेशन नाकाम होता है तो उसे दोहराना बहुत मुश्किल होता है।''

इससे पहले कि आप एक ही शख्स के इन बयानों को किसी खास चेहरे पर चस्पां करें, मैं बता दूं कि यह पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल के बयान हैं। जिनकी क्षमताएं, ईमानदारी और अपराध से लड़ने की कूव्वत असंदिग्ध है। उनके इन बयानों को पढ़कर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट की राह पर हमें क्या हासिल होने वाला है। एक शांतिपूर्ण जीवन का इंतजार करती नक्सली इलाके की जनता के लिए गोलियों की आवाज कभी नई नहीं रही है। उन्हें चलाने वाले हाथ बदलते रहे हैं, लेकिन निशाने पर हर वक्त वे आदिवासी ही रहे हैं, जो विकास की कीमत तो चुकाते ही हैं। आपराधिक राजनीति के नये हथियार के लिए भी आसान मोहरा बनते हैं। यह नया हथियार है, नक्सलबाडी चेतना से भटके चंद सिरों को पूरे विचार का जामा पहनाने की जिद.

आखिर यह ऑपरेशन ग्रीन हंट सरकार की ओर से उछाला गया एक जुमला है, या किसी विशेष रणनीति को अंजाम देने की कवायद? सवाल जितना सपाट है, इसका जवाब भी उतना ही सपाट है। लेकिन उस जवाब से सरकार इत्तेफाक नहीं रखती। सरकारी बयान की मासूमियत बताती है कि यह ऑपरेशन विकास के रास्ते में आने वाली अड़चनों को ठीक करने भर का अभियान है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा वह वर्ग भुगतेगा, जिसके पास विकास की अपनी अवधारणा है और वह किसी भी कोण से सरकारी विकास की पर्याय नहीं है। यह वह आदिवासी वर्ग है, जो हालिया सरकारी ऑपरेशन की सबसे ज्यादा कीमत चुकाने वाला है। ऑपरेशन ग्रीन हंट की सफलता या असफलता इसी वर्ग के खून और हकों पर कब्जे से जुड़ी है। इस बार भी कहानी के पन्नों पर किसका खून बहेगा और कौन उजड़ेगा? यह बता पाना बहुत मुश्किल काम नहीं है।

असल में सरकार की इन्हीं नासमझ योजनाओं के कारण नक्सलियों को वह खादपानी मिलता है, जो उन्हें मजबूत बनाता है। यह मजबूती भय, बंदूक और हासिल होने वाली ताकत के सपने से जुड़ी है, जिसका फायदा तथाकथित गुरिल्ला वॉर (गुरिल्ला वॉर एक बिल्कुल अलग तकनीक है. झारखंड, उडीसा, छत्तीसगढ और आंध्रप्रदेश में जो लडाई चल रही है, वह गुरिल्ला वॉर नहीं है, इस पर विस्तार से अगली किस्तों में) करने वाले मनमौजी लड़ाके उठाते हैं।

विकास के एकांकी पक्ष की रोशनी में ग्रीन हंट के अभियान को देखना एक भोली मूर्खता ही है। सरकारी कार्यों की राजनीति और उसके निहितार्थों को समझने की जिद के साथ यह समझा जा सकता है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट असल में वह प्रक्रियाहै, जिसका इस्तेमाल सरकारें समय-समय पर अपनी ताकत दिखाने और किसी भी गलत निर्णय को मनवाने के लिए करती हैं। नक्सलियों के खिलाफ शुरू हुए इस अभियान का कार्यक्षेत्र जिन इलाकों में है, वहां अदिवासी बहुल जनता रहती है।

दिलचस्प यह भी है कि इसी आदिवासी जनता के हकों के लिए सरकारें अपनी चिंताएं जोरलृशोर से जाहिर भी करती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामान्य सुविधाओं से वंचित इस समुदाय को भारतीय विविधता के रूपक के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। गणतांत्रिक परेडों में चमकदार झांकियों के बीच जो बात भुला दी जाती है, वह यह है कि आदिवासी समुदाय पर विकास की दिल्ली मार्का अवधरणाएं लागू नहीं की जा सकतीं। हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश और पंजाब के कुछ इलाके जिस तेजी से समृद्ध हुए हैं, उसी तेजी से वहां अपराध की दूसरी किस्में भी ईजाद हुई हैं। जो गुजरात, विकास के सरकारी मॉडल के बरअक्स अपराध के दलदल में नहीं फंसा, वहां समुदायों के बीच घृणा बढ़ी और मराठी मानुष पूरे देश से अलग-थलग श्रेष्ठताबोध के दंभ में उलझ गया। विकास के जमीन हड़प अभियान के इस नकारात्मक पक्ष को नजरअंदाज कर भी दिया जाए, तो यह सवाल चुभता है कि आखिर कितने लोगों ने इस विकास की चमकती रोशनी में अपनी दुनिया को संवारा। यह संवारना सांस्कृतिक महत्व की रोशनी में भी देखा जाना चाहिए। तब दिखाई देता है कि जिस गंगा-रावी-साबरमती-गोदावरी के मैदान में यह विकास का रथ सरपट भागा था, वहां सांस्कृतिक विविधता का वैसा घटाटोप नहीं था, जो आदिवासी इलाकों की सुदीर्घ पारंपरिकता में मिलता है।

नक्सली आतंक की रंजिश में सरकार ने यह बात तकरीबन भुला दी है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट के फौजी बूट जिस जमीन को रौंदने वाले हैं वहां कुछ सबसे पुरानी सभ्यताओं वाले हाथ मानव सभ्यता की सबसे पुरानी लय को जीवित रखने की ईमानदार कोशिश कर रहे हैं। जिन नक्सलियों के नाम पर यह अभियान चलाया जा रहा है, उनके बारे में सरकारी समझ भी इतनी भर है कि झारखंड, बिहार, बंगाल, छत्तीसगढ, आंध्रप्रदेश में कुछ हजार लोग जंगलों में स्कूलों, रेल संपत्तियों, पुलिस थानों और सरकारी भवनों को विस्फोटकों से उड़ाने की नितांत फौरी कार्रवाइयां कर रहे हैं। सरकार यह समझने को क्यों तैयार नहीं है कि अगर यह वामपंथी विचार की कोई राजनीतिक तैयारी है, तो इसके निशाने पर जनता की संपत्तियां क्यों हैं? रूस चीन, क्यूबा, निकारागुआ और बोलिविया में जिन क्रांतियों को नक्सली राजनीति की परंपरा कहा जा रहा है, वहां प्रक्रियाएं दूसरी थीं। भगवान (जो कि कहीं नहीं है) के लिए यह भोला तर्क मत दीजिए कि भारतीय परिस्थितियां अलग रणनीति की मांग करती हैं और यहां के नक्सली वही कर रहे हैं। यह साफ कुतर्क है, जो अपराधियों को एक विचार की आड़ मुहैया कराता है।

असल में यही सरकारी समझ एक बड़े सवाल को नजरअंदाज कर तात्कालिक कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश से ज्यादा जमीन तैयार नहीं कर पाती। असल मसला फिर वही है कि आखिर क्यों आदिवासी इलाकों में ही नक्सल समर्थक या विरोधी अभियान चलाये जाते हैं? क्यों आदिवासी युवा ही जंगलों में भटकते हुए अपनी ही सरकार के निशाने पर होते हैं? और क्यों आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने की नासमझ कोशिशों के बदले में खूनी खबरें देखने को मिलती हैं?

सरकार की समझ पर शक तब भी होता है, जब वह बंदूक की नली के मुहाने पर खड़े आदिवासी युवकों की पहचान नक्सलियों के तौर पर करती है और बिना किसी पुख्ता सबूत के हर आदिवासी युवक की लाश पर नक्सली होने का ठप्पा लगा देती है। अगर सचमुच सरकारी गोली से बीते दस सालों में करीब 7 हजार नक्सली मारे गये हैं, तो सरकार को सोचना चाहिए कि आखिर उसकी नीतियों में वह कौन सी खामियां हैं कि जिंदगी की पूरी खूबसूरती से किनारा करके इतनी बड़ी तादात में आदिवासी युवा हथियार उठाने पर मजबूर हैं। जबकि वे अच्छी तरह से जानते हैं कि सरकारी ताकत के आगे उनकी बिसात कुछ भी नहीं और किसी न किसी सरकारी गोली पर उनका नाम भारत सरकार के नक्सल (आदिवासी) विरोधी अभियानों की ग्रीन हंटी मिसालों में कैद में। अपने खिलाफ खड़े लोगों से अगर सरकार गोली के अलावा किसी अन्य भाषा में बात नहीं कर पा रही है, तो सरकार को अपनी कार्यक्षमता और भाषायी दरिद्रता को ठीक करने के लिए भी ऑपरेशन की दरकार है। क्योंकि जो भाषा सरकार बोल रही है, वह आदिवासियों की तकरीबन 100 से ज्यादा भाषाओं (जी हां भाषाएं!! बोलियां नहीं, क्योंकि आदिवासी भाषा की अपनी विशिष्ट लिपि है।) से मेल नहीं खातीं। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार जल्द वह भाषा सीखेगी, जो देश की आदिवासी और संसाधनों से वंचित जनता को अपनी लगेगी।

2 comments:

pradeep said...

pata nahi kab sikhegi sarkar?
khair aap kahana ho?

http://www.rajkaj.blogspot.com/

akhilesh said...

कितना अजीब है जब अपने लोग अपने ही लोगों द्धारा मारे जाते हैं । आजादी इस लिए थी कि हमें गुलामी से आजादी मिलेगी । लेकिन आजादी के साठ साल बाद भी आजादी एवं हक के लिए नक्सल लडाई लड रहे हैं । आज भी पूंजीवादी लोगों द्धारा उनका शोषण किया जाता है । न्याय एवं अधिकार के बदले पुलिस की लाठियां खाते लोग आखिर में बन्दूक नहीं उठाएं गे तो क्या उठाएंगे ।
anvigilantcitizen.blogspot.com