August 16, 2010

आजादी के लाइव शोर के बीच एक खतरनाक चुप्पी

आजादी की 63वीं सालहगिरह के करीब चार घंटे पहले एक बुजुर्ग पत्रकार मित्र ने कहा कि "जन भावनाओं के खिलाफ नहीं लिखना चाहिए।" मसला था आमिर की पीपली लाइव के खिलाफ उठा विद्रोह। हम दूसरा पक्ष सामने लाने से घबराते क्यों हैं। अच्छी फिल्म है। इस दौर की बाकी फिल्मों से बेहतर है। लेकिन उसमें खामियां हैं, तो उन पर बात क्यों नही! जब हम पीपली लाइव की व्याख्या कर रहे थे, ठीक उसी वक्त अलीगढ़ से किसानों के गुस्से की खबरें रही थीं। उनके सूत्र वाक्य का कुल जोड़ यह था कि जनता अगर पीपली लाइव को पसंद कर रही है, तो उसके खिलाफ नहीं लिखा जाना चाहिए। अजीब है। मुझे आमिर निजी तौर पर पसंद हैं, उनकी फिल्में में पहली नजर में देखने से 'प्रोग्रेसिव' लगती हैं। थ्री इडियट्स, तारे जमीन पर, लगान, रंग दे बसंती, मंगल पांडे और अब पीपली लाइव। असल में आमिर एक सुलझे हुए प्रोफेशनल हैं। वे जानते हैं कि क्या बिकता है। अपने दर्शक वर्ग की गहरी समझ और बेहद हल्की फुल्की कॉमेडी के साथ दो-चार समझदारी की बातों के अलावा आमिर की फिल्में एज होल एक -राजनीतिक नासमझी का नमूना ही हैं। पीपली लाइव इसकी अगली कड़ी है। पीपली लाइव के आने का वक्त देखिये। गांवों में काम कर रहे संगठनों, ईमानदार राजनीतिकों (चौंकिये मत, ईमानदार राजनीतिक हिंदुस्तान में ही हैं, और वे संसदों-विधानसभाओं के दरवाजों पर हाथ जोड़े नहीं खड़े होते। इसीलिए मीडिया की नजर भी उन पर नहीं पड़ती।) की लंबी कोशिशों और कुछ जिम्मेदार पत्रकारों की खबरों के माध्यम से जब देश के किसानों के पक्ष में माहौल बनने लगा था। थोड़ी गंभीर बहसें और संसद-विधानसभाओं से सवाल किये जाने लगे थे, तो यह फिल्म आई है। कोई काम किस वक्त में किया जा रहा है, यह उसकी प्राथमिकता तय करने के लिए जरूरी औजार है। आमिर की पूरी फिल्म में एक ट्रेजडी को हास्य के अंदाज में पेश किया गया है। हास्य से मुद्दों को दबाने की कोशिश का यह एक और नमूना है। ट्रेजडी के साथ किसान को इस स्तर तक लोभी बताया गया है कि वह हत्या तक करता है। आत्महत्या के लिए उकसाता बड़ा भाई किस रूपक को गढ़ रहा है?
जाहिर
है, आमिर के प्रसंशकों और हमारे वक्त की घटिया फिल्मों के बीच एक थोड़े चालक फिल्मकार की चासनी हमें पसंद आती है और इसे ही हम प्रोग्रेसिव समझ लेते हैं। 'तारे जमीन पर' में भी ईशान अवस्थी कोई सामान्य बच्चा नहीं है। वह एक हुनरमंद और आम बच्चों से अतिरिक्त योग्यता रखने वाला बच्चा है। आमिर इस आइडिया को कैश करते हैं और हम हर बच्चे से अतिरिक्त गुणों की मांग करने लगते हैं। असल बात यह है कि फिल्म इंडस्ट्री में 'सामान्य' के लिए कोई जगह नहीं है। चमत्कृत करने वाला पात्र चाहिए।
पीपली लाइव इस बात को फिर साबित करती है कि इतिहास और घटनाओं के सामाजिक यथार्थ पर हमारी फिल्में अब महज बचकानी रह गई हैं। पीपली लाइव के बारे में बात करते हुए हमें यह भी देखना चाहिए कि आमिर का दर्शक कौन है? मल्टीप्लैक्स के इस दौर में हिट का फार्मूला बेहद साफ है। अपर क्लास की जिंदगी को बेचा जाना है। हजार रुपये तीन घंटे में खर्च करने की औकात रखने वाले ही मल्टीप्लैक्स के एक्सीलेटर पर पांव रख सकते हैं। जिनका जिक्र ऊपर किया था उन्हीं मित्र से मेरा एक सवाल था क्या एक आम रिक्शा चालक या रेहड़ी वाला मल्टीप्लैक्स में सामान्य ढंग से फिल्म देख सकता है। आप भी जानते हैं नहीं। एक रिक्शा चालक जो 100 रुपये की शराब पीता है और एक सामान्य मध्यवर्गीय दुकानदार जो पांच सौ रुपये दोस्तों के साथ ढाबे पर खाने और शराबनोशी में उड़ा देता है। वह भी मल्टीप्लैक्स की चकाचौंध के बी असहज महसूस करता है। हकीकत तो यह भी है मध्यवर्गीय युवाओं और गांवों से आते किसान परिवारों के महत्वाकांक्षी युवा भी मॉल्स में असहज ही दिखते हैं।
यह फिल्मों, ग्लैमर और तेज होती खाइयों का असर है। आजादी के शंखनादी शोर में रेशा-रेशा करके देखना चाहिए कि हम अंग्रेजों के 'डिवाइड एंड रूल' के कितने आसान शिकार हैं आज भी। ऑफिस से लेकर घर और सड़क से लेकर संसद तक यह फर्क साफ देखा जा सकता है। अलग दिखना, विशिष्ट होना हमारी कमजोरी है। यह विशिष्टता कभी 'आमिर ब्रांड' के रूप में सामने आती है। कभी 'युवा राजनीति' के रूप में।
बहरकैफ। आजादी मुबारक। लेकिन यह शुरुआत है। धीमी शुरुआत। आने वाले सालों में इस धीमेपन की भरपाई के साथ और तेजी की दरकार है। उम्मीद है हम इंडिया और भारत की खाई को पाटकर आगे बढ़ेंगे।
और अंत में आज का फेसबुक मैसेज
हिंदुस्तान अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सिरमौर बन सकता है। 70 साल बाद। इसमें 10 साल आगे-पीछे किये जा सकते हैं। यानी कम से कम 60 साल और अधिक से अधिक 80 साल। शर्त यह है कि उसके लिए आज से ही बदलाव और कार्रवाई शुरू की जाये। 2020 के बारे में किये गये सरकारी दावे में जरा भी दम नहीं.

3 comments:

माधव said...

wah

हिमानी said...

फिल्म देखी नहीं है मशहूरी के आलम में सिफॆ चरचा में शामिल रही तो कुछ बातें पता चली इसलिए फिल्म पर कुछ नहीं। लेकिन फिल्मों में सामाजिक यथाथॆ परोसने और उसकी सामाजिक प्रतिक्रिया से इतर एक यथाथॆ ये भी है कि लोग हर बात को अपने यथाथॆ से जोड़ कर देखना चाह रहे हैं। फिल्मों के साथ अक्सर ऐसा होता है। एक यथाथॆ ये भी है कि मुआवजों को लेकर आपस में ही घर के लोग लड़ रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा मुआवजा पाकर वो खेती को छोड़ देना चाहते हैं। हालांकि दूसरा मुद्दा ये भी हो सकता है कि ऐसी जमीनों का अधिग्रहण क्यों नहीं किया जाता तो खेती योग्य नहीं है। दरअसल कुछ सच हमारे बीच ही हैम बेहद कड़वे गम सामना नहीं करना चाहते और फिल्म जैसे मनोंरंजन के माध्यम से तो कतई नहीं ....

पुष्यमित्र said...

क्या किसानों की समस्याओं का हल मुआवजे हैं. क्या लगान से बचने का रास्ता क्रिकेट है...

पता नहीं...मगर आम जीवन की हर समस्या से पीछा छुड़ाने के सबसे बेहतर रास्ते क्रिकेट, सिनेमा और टीवी हैं...

भाई सचिन बीटी कपास की दुश्वारियों और बीटी बैगन की साजिशों पर फिल्म नहीं बनाई जा सकती. फिल्म में यह भी नहीं दिखाया जा सकता कि कोल्ड स्टोरेज की कमी से किसानों को नुकसान और भुखमरी जैसी समस्याएं पैदा होती हैं...फिल्म में यह कैसे बताओगे कि यूरिया की कालाबाजारी की साजिश के पीछे किसका हाथ है. मौसम विभाग किस तरह खाद कंपनियों के हाथों का खिलौना बन चुका है.

सबसे शातिर झूठ वही होता है जो झूठ नहीं लगता़ जो हकीकत के करीब लगता है. आमिर ऐसी झूठ गढ़ने और उसे ऊंची कीमत में बेचने के माहिर हैं...