कहानी नंबर एक
यह कहानी उन दिनों की है जब सूरज दिन में निकलता था, पूर्व दिशा से निकलता था और पश्चिम की तरफ डूबता था । उन्हीं दिनों लोग दिन के समय जागते थे और ज़्यादातर जागते समय रोजी रोटी कमाने के लिए कुछ भी मतलब जो मिल जाये वो काम करते थे । हालांकि कुछ लोग सिर्फ मौज मस्ती के लिए भी काम करते थे लेकिन एक तो उनकी संख्या कम थी दूसरे उनके बारे में हमारी कहानी नहीं है इसलिये उनका जिक्र मुल्तवी रखते है । तो बात करते हैं कहानी के उन लोगों की जो हमारे मतलब के हैं । इनमें एक की उमर सात साल की है वह एक लिमिटेड कम्पनी में सीईओ है । (अब यार मों मत बनाओ कहानी हम बता रहे है के तुम) तो उमर सात साल । नाम सैंडी . सैंडी के एक माँ, एक बाप, एक बहन, एक दादा और एक दादी थे । सैंडी की कम्पनी का नाम था ट्रूबेला ।
30 May, 2007
दो कहानियाँ
27 May, 2007
मुझे भी आपसे कुछ कहना हैं
दोस्तो
मैं पहली बार आप लोगों से सीधे सीधे मुखातिब हूँ । या यूं कहूं कि अपनी ओर से कुछ कहने की हिम्मत कर पा रह हूँ ।
दरअसल आप जानते ही हैं कि मैं सबसे ज्यादा बेतुकेपन से डरता हूँ । और अब तक तुकें ही दूंढता रहा हूँ । इस बेतुकी बात मैं आपकी दिलचस्पी नहीं होगी लेकिन आप इससे जुडे हैं । मैं महसूस कर रह हूँ कि इन दिनों मैं और अधिक बेतुका हो गया हूँ । यहाँ यह बात पूर्व निर्धारित है कि मैं पहले ही यानी जन्मता बेतुका था । असल में मेरे बेतुकेपन में आपका भी योगदान है जिसे कोई कैसे नकार सकता है । आप यानी जो जालन्धर से बंगलूरू और अहमदाबाद से रांची और मुम्बई से गुवाहाटी तक फैले हुए हैं । जो सबसे ज्यादा भोपाल, रांची, दिल्ली और मेरठ में पाये जाते हैं । आप जिनसे मिलकर मैं इतना बेतुका हो गया हूँ कि ना अब कोई तुक की बात लिख पा रहा हूँ ना कह पा रह हूँ ।
मैं चाहता हूँ कि मैं अपने बचपन में लौट जाउँ अपने पूरे बचपने के साथ । इसका एक तरीका यह है कि मैं अपने भीतर अब तक की सारी सीखी सिखाई बातें बाहर उलीच दूं । वे बातें जो चौक-चौराहों, पान की गुमठियों, घरों, दफ्तरों, सड़कों, छतों, पबों यानी हर ऐसी जगह जहाँ दो इन्सान खडे हो सकते हैं, पे आप लोगों से सीखीं । सिग्रेट पीते, पान चबाते और बियर-विहिस्की पीते-पिलाते हुए आपने बताईं । कुल जमा जोड़ यह की जीवन के २६ वें वसंत में मैं थक गया हूँ । और मुझमें भरी आपकी भीड़ धक्कम धक्का रेलमपेल मचाये हुए है । अब आराम से अपने बचपने में जाने का तरीका यही है कि दिमाग का सारा अगड्म बगड्म फैंक डालूँ । इसमें जो सच होगा वह आपके हिस्से का होगा और जो झूठ जैसा लगेगा व होगा मेरे हिस्से का सच । यानी जो लिखूंगा सच लिखूंगा सच के अलावा कुछ ना लिखूंगा और लिखूंगा भी तो सच सच बताकर लिखूंगा । तो शुरू करते हैं शुरू से.
24 May, 2007
अमलतास
मौसम हुआ मनमौजी
अमलतास के फूल झरे
अल्हड हुई पूरवाई भी
कहती हैं नदिया के पार चलें
यह बस्ती हैं यायावरों की
मिल लें दिल भर कर गले
तू फरेबी, तेरे वादे झूठे
फिर भी मन कहे, प्रीत पले
पटकथा लिखेंगे अश्कों से
बस, स्याही हाथ के साथ चले
वो गाता है शायद मन रोता है
तपती धरती पर जैसे अकेली बूँद जले
निरुत्तर
संजय कुमार शर्मा
सर्द शाम । उस पर भी मेरठ-दिल्ली नेशनल हाइवे पर खडे होकर बस का इन्तजार करना बड़ा दुरूह था मेरे लिए । एक बड़ा सा वहां पास से गुज़रता तो उड़ती हवा तन बदन को झकझोर जाती ।
अँधेरा घाना होता गया । जैसे जैसे अँधेरा बड़ा मेरी व्याकुलता भी बदती गई । गाजियाबाद सिंहानी चुंगी पर खडे होकर पहले मैं बस को हाथ देता और बाद मैं गलियां । मेरी उम्मीद और जरूरत के मुताबिक बस रुकती नहीं और मैं फफक पड़ता हूँ । हरामी ......साले....आम आदमी की कोई परवाह नहीं । कोई डिसिपिलन नहीं रह देश मैं । तभी एक बस रुकी । उसने इत्तमीनान से मुझे बैठाया और चल दिया ।
थकी हुई बस । रुकती तो चलने का नाम ना लेती और चलती तो मानो रेंग रही हो । मैं अब भी व्याकुल था बिफ़र रहा था...हरामजादे हर जगह रोक देते हैं....कोई नियम कानून नहीं । बस को रेंगता देख ना रहा गया तो मैं भिड़ गया कंडक्टर से । जब बस मैं जगह नहीं है तो जगह जगह क्यों रोक देते हो ....हमें घर भी जाना है । कोई ध..र...म....शा....ला... ।
मेरी बात बीच मैं ही काटते हुए कंडक्टर बोला 'भाईसाहब दस मिनिट पहले बस ना रोकता तो आप कहॉ होते । सोचो कि आप नीचे खडे हैं और ........ ।
मैं निरुत्तर था ।
23 May, 2007
चुप्पी
9 May, 2007
भाषाई साम्राज्यवाद!!
तब तो भाषाई कट्टरता की बात भी हो सकती है. पूरे ब्लोग में बमुश्किल १० प्रतिशत भी अन्ग्रेज़ी नहीं है और आप बात भाषाई साम्राज्यवाद तक ले गए. प्रतिक्रियावाद के लक्षण दिख रहे हैं. अविनाश भाई यह सीधी सीधी सुविधाभोगी प्रवृत्ति ही है, जो काहिली और जल्दबाजी के मेल से उपजती है. क्यों नहीं मानते कि हिंदी में लिखना अभी भी बहुत जल्दी का काम नहीं है. जहाँ तक अन्ग्रेज़ी में ब्लोग शुरू करने की बात है तो यूं भी मैं हिंदी में ज्यादा सहज महसूस करता हूँ. वैसे सुझाव के लिए धन्यवाद.
संदर्भ : अजय के लिखे पर अविनाश जी की टिप्पणी
Spiderman under the influence of Bollywood!
4th April Hollywood release one more Spiderman series movie. I also went to saw it bcoz i want to know what next. Film is good and deafinetly it will entertain auidence. Film has good story and action. It
has also some new super villian. It shows even a superhero also want to live like a simple man. He wants to spent time with girlfriend, he has great emotion towards his uncle and aunty. It also shows that even a Superhero has dark side.
At that day I was along with my three friends. We went to enjoy spiderman and we had enjoy. Seeing the movie somethings click me. May be it my own idea and you are not agree with it. I connected it to Bollywood and thought that Hollywood is now under the influence of Bollywood. First is its length. It is of almost more than two and half hour. I have seen many Hollywood movies and not able to recall that any Hollywood movie is so long. I have seen Godfather as a long movie. In this film Spiderman is fighting with his own problem just like
Bollywood heros do in there movies. You can say unnecessary length. There is also songs like Bollywood movies. Mine friends also commented that Spiderman is behaving like Bollywood movies. Remember one thing i am not criticsing Bollywood. Infact i am great fan of Bollywood. People always says that Bollywood copies Hollywood here i am trying to explain that now Hollywood also started copying Bollywood.
आधे अंधेरे समय में
कुछ साथियों के लिए 'आधे अँधेरे समय में’ एक आत्मीय याद हैं, तो कुछ के लिए यह एक खूबसूरत सिँफनी, कुछ के लिए अँधेरे में चमकती एक साफ शफ्फाक रोशनी, तो कुछ के लिए उबड़ खाबड़ रास्तों पर चलने का हौँसला देने वाली एक शानदार कविता…… लेकिन सभी के लिए यह मनुष्यता के पक्ष में इस्तेमाल किया गया एक मजबूत हथियार हैं
2002 में ‘आधे अँधेरे समय में’ के दूसरे प्रदर्शन के दौरान मैंने कुछ निजी अनुभव अर्जित किये, जो सार्वजानिक जीवन में कई बार मुझे संभाले रहे, अन्य मित्रों के साथ भी ऐसा हुआ होगा (मुझे लगता है). रिहर्सल के दौरान अनौपचारिक बातचीत में पुष्य मित्र जी ने एक बार कहा था ‘ कविता अपने भाव से अधिक उसकी धार के कारण याद रहती है, हालांकि धार या तेवर भी भाव का ही विस्तार हैं.’ पता नहीं उन्होंने यह बात सिर्फ कहने के लिए कही थी या पूरी गंभीरता से, लेकिन अगर इसी में अपनी बात जोडूं तो- कविता उतने ही ज्यादा दिनों तक पाठक के साथ चलती है, जितनी वह जीवन के करीब होती है. इसका उल्टा भी मुझे उतना ही ठीक लगता हैं. यानी जो जीवन के जितना नजदीक होगा कविता के उतने ही पास जाएगा. बार बार लगातार.
इस मायने में ‘आधे अँधेरे समय में’ भरोसा देने वाली कविताओं का समुच्चय है. जीवन का भरोसा देने वाल कविताओं का समुच्चय.
धन्यवाद मनीष मनोहर भाई यह कोलाज तैयार करने के लिए. आपमें से कई ने इस कोलाज का मंचन देखा होगा. तो याद कीजिये भारत भवन की वह सम्मोहित कर देने वाली शाम और लीजिये आस्वाद इन बेहतरीन अल्फाजों का.
आधे अँधेरे समय में
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(16 मार्च 2002 को हुये ‘ आधे अँधेरे …’ के दूसरे मंचन में स्म्रृति पथे, वाई वंदना, इफ्फत अली, वर्षा निगम, ऐम अखलाक, शिरीष खरे और रूपेश कुमार के साथ मैंने अभिनय किया था. निर्देशन का जिम्मा सच्चिदानंद जोशी सर के साथ पशुपति शर्मा जी ने संभाला था. जयंत सिन्हा, पुष्य मित्र, रवि दुबे, प्रभात कुमार, बासु मित्र, सेवियो, अविकांत बेले, संदीप ठाकुर, अनुपमा, शिखा, मोहन, प्रवीण भाई ……… और ….और …और … ने प्रस्तुति को मंच तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निवाही थी.)
पहली बार पढ़कर
रमेन्द्र नाथ झा हमारे मित्रों कि उस सूची में आते है जहाँ बेध्यानी और ध्यान से कही गई बातें येकमेक हो जाती हैं. सलीके की आवारगी को आवारा सलीकों से अंजाम देने वाले रमेन्द्र ने हाल ही मॆं शिवानी को पढ़ा. शिवानी को पढ़ना किसी के भी जीवन की महत्वपूर्ण घटना हो सकती है. रमेन्द्र के साथ भी ऐसा ही हुआ. उन्होंने इस पर जो लिखा वो आप लोगों के सामने है.
आज शिवानी को पढ़ा. अच्छी लगी. शिवानी नहीं उनकी कहानियाँ. वर्ल्ड लाफ्टर डे पर लिख रह हूँ, भाषा बहक रही है क्या? शायद आपकी टिपण्णी ऐसी ही हो सकती है, लेकिन शिवानी कि उन कहानियों को पढ़कर पहली बार पता चला कि क्यों बार बार लोग दुहराते हैं 'कल कि बात आज भी प्रासंगिक है'. दुहिता, जननी, अबला, शोषित जैसे ना जाने कितने विशेषण किताबी लगते है. फिर भी इन विशेषणों को पढ़ना अच्छा लगता है. विजय तो कहता है कि तुलसीदास तक ने इन्हें नही छोडा. बात से नहीं कलम से उनकी दशा लिख डाली. फिर भी 'पूतोंवाली' (शिवानी की कहानियों का संग्रह) निश्चय ही कुछ हट कर है. अव्वल उसमें पारम्परिक रोना धोना नहीं है या फिर हिम्मत कर फूलन देवी बनने कि दास्ताँ भी नहीं. यही खासियत अच्छी है. शिवानी को इससे पहले पढ़ा हो याद नहीं. उनकी बेटी को 'हिंदुस्तान' मैं पढने का शौकीन था. बाद मैं लगा कि वह भी शब्दों से खिलवाड़ कर बडे अखवार की सम्पादक होने का खिलन्दड़्पना ही दिखाती हैं. इसलिये उन्हें पढ़ना छोड दिया.अब पढ़ूंगा. देखूंगा कि माँ-बेटी किस मोड़ या स्तर पर एक-दूसरे से टकराने योग्य थीं.
आह्सन वफ़ा दोस्ती
यशपाल जीँ हमारे अग्रज हैं, पत्रकारीय भी और सामाजिक भी. यूं उनका मन खेल मैं रमता है लेकिन अपने निजी क्षणों में वे कविताई भी करते हैँ । वे ना तो शौकिया कवि हैं और ना ही आनंदवादी लिख्खाड. उन्हें कविता के पास जाते हुए किसी विशिष्ठ आलंबन कि जरूरत भी नहीं होती है . राह चलते..सड़क पर..बिस्तर पर या फिर किसी स्टोरी पर ही काम करते हुये कहीँ भी कभी भी वे कविता से आंखें चार कर लेते हैं. ज्यादा क्या कहें आप ही पढिये-अहसान वफ़ा दोस्ती सब भूल गए हैं हम
जिन्दगी की तलाश में जिन्दगी को भूल गए हैं हम
घर छोड़कर रोज़ी तो मिल गई
पर अपने घर का पता भूल गए हैं हम
तारों कि तरह गिनता हूँ नोटों कि गड्डियाँ
घर बीमार मां हैं, यह भूल गए हैं हम
इतने नकाब ओढ लिए हैं यश तुमने
कौन सा चेहरा असली है, यह भूल गए हैं हम
फांककाशी मैं मेरा था जो हमसफ़र
उस दोस्त को भी कभी का भूल गए हैं हम
हूक सी उठती है अब भी तेरे नाम की
कब छूट था तेरा हाथ, यह भूल गए हैं हम







