June 10, 2007

मनोज झा की दारू पार्टी

मनोज जी ने इन दिनों दारू छोड़ रखी है । इसे यूं कहें तो ज्यादा सही होगा कि सबके सामने छूते ही नहीं है । ब्लोग पर पहली बार आये हैं । उत्साह बड़ाइये । जूतामपैज़ार बाद में करिये
इधर कई दिनों से ख्वाब दिन में परेशान कर रहे हैं । जिस्म पिघलाने वाली गर्मी और उमस में जब आज थोडी देर के लिए कूलर की छाँव में झपकी ली तो कम्बख्त ख्वाब फिर छेड़खानी करने लगा । देखता हूँ कि किसी नंगी छत पर शाम के धुंधलके में चार यार मिल बैठे हैं और एक थैले में दारू की कुछ बोतलें पडी हैं । दोस्तो में यशवंत जी और गांव के मेरे अजीज़ लड्डू काका की स्मृति है बाकी का पता नहीं । जगह भी पता नहीं हाँ अर्ध ग्रामीण टाइप परिवेश था । अरविंद सांगवान के घर पूंठ जैसा । थैले से बोतलें निकालते समय भिड़ गई और टूट गईं । जमने कि छोड़िये महफ़िल सजने से पहले ही वहां अफरा तफरी मच गई कोई कटोरा तो कोई गिलास लेकर थैले पर लपका । थैला किसी जाफरानी जर्दा कम्पनी का था और कपडे कि मोटी परत थी । थैले में बोतल और नमकीन के अलावा मूली, गाज़र, खीरा, प्याज़, हरी मिर्च, छूरी, कागज की प्लेटें, किसी बंधू की कैप आदि पडी थीं । पांच सात खडे खडे नीट पीने वाला लड्डू भड़का - भोसडी का सब गुड़ गोबर हो गया । इतने में यशवंत जी बोले - डायरेक्ट पीने वाले देर ना करें, चुल्लू बनायें, में सीधे उसमें डालता हूँ, थैले में दारू अभी पडी है । देखा तो प्याज़ के छिलके व गाज़र आदि की मिट्टी से सनी हुई दारू बाहर झांक रही थी । खांटी दरूबाजों की महफ़िल में कुछ ने मुहं में गुटका भरे रहने के बावजूद फुर्ती की और चुल्लू बाँध लिया । इतने में लाईट गायब हो गई और गर्मी के भाबके से आंख खुल गई । करीब महीने भर से दारू छोड़ने के बाद उसने आज पहली बार ख्वाब में दबोचने की कोशिश की ।