June 14, 2007

स्कूल से आती जाती लडकियां

कल जो कविता डाली थी उस पर टिप्पणियाँ तो आपने देख हीं लीं हैं । कुछ मित्रों ने फोन भी किया. उत्साहित हूँ सो एक और पेल रह हूँ. यह जालंधर में लिखी थी. शायद मार्च 2003 था । लीजिये चाखिये जरा.

जहाँ में खड़ा हूँ
वहां से दिख रहीं हैं
स्कूल आती जाती लडकियां
पहले इनकी जगह दूसरी लडकियां गुज़रती थीं यहाँ से
इनके बाद कोई दूसरी गुज़रेंगी

इस सच से अनजान और लापरवाह लडकियां
खिलखिला रहीं हैं
चुहल कर रहीं हैं
(जैसे कह रहीं हों )
देखो हमारा हौंसला
बुरे से बुरे वक़्त में हंस सकती हैं लडकियां

इन्हें पता है कि
एक एक कर विदा हो जायेंगी वे
अपने भाइयों के घरों से
जो हिम्मती होंगीं
वे चुन लेंगीं
अपनी पसंद का लड़का
बाकी माँ बाप की मजबूरी और हैसियत
गले में लटकाकर
चल देंगीं भाइयों के घरों से निकलकर
अदेखे चेहरों के पीछे

क्या सचमुच इन्हें भय नहीं है ?
इनके उजास और भरे चहरे
गृहस्थी के चरखे में घूमकर लटक जायेंगे

ये लडकियां सास के दुलार और दुत्कार को
एक भाव से लेकर
खटती रहेंगी
बच्चों की पैदाइश में ढीली होकर
झेलती रहेंगी पति की उपेक्षा और दंभ

ऐसा ही होता रहा है
होगा
और (शायद) होता रहेगा !!

सब कुछ जानते हुये भी
खिलखिला रहीं हैं
हंस रहीं हैं
चुहल रहीं हैं
बेपरवाह, बेफिक्र,........ बेशर्म !!
स्कूल से आती जाती लडकियां .

9 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

अच्छी रचना है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Manish said...

शायद अपनी आने वाली जिंदगी के बारे में इन्होंने सोचा नहीं है।
इसीलिए तो है इनकी निर्बाध हँसी !
जरुर आयें जी। आपसे मिलकर प्रसन्नता होगी। चिट्ठे का लिंक जोड़ने के लिए धन्यवाद !

manya said...

Kya kahun... aisa lagta hai bachpan aur school saamne khada ho gaya hai.. aur school se aate jaate group mein gunjati hansi... kaano mein sunaai de rahi hain.. Ladkiyan bachpan mein jitni alhad uar naadan hoti hai.. utni hi jaldi badi ho jaati h ain.. aur bachpan mein dekhe sapno mein aayi hansee bhoolkar.. bade hokar mili mushkilon se jaldee samhauta bhi kar leti hain... aur fir goonjati hansee.. halki si muskurahat mein badal jaatee hai..

Saurabh said...

sachi bhai ye wahi kavita hai, jo maine aapse kanpur mein sunane ko kaha tha, aur jis kavita ko sunkar main aapka fan ho gaya tha (Tab delhi mein tha aur ye nahi pata tha ki is kavi ke andar aur bhi bahut sare gun chipe hain). Arun narayan ne mujhe ye kavita sunai thi. Ek baat batayen aap bhadaas per kuch aur nai ibarten per kuch aur kaise ho jate hain. sachin tere kitne roop??????

Saurabh said...

Bhai kabhi saurabhcampus per bhi kuch post kar diya karen

Rama said...

बुरे से बुरे वक़्त में हंस सकती हैं लडकियां- शानदार. कभी मौका मिला तो मिलेंगे इन्ही के साथ में. बढ़िया लिखते हैं.

Paresh said...

nice one bhai accha hain. mujhe nahi pata tha tu itna emotioan wala banda hain realy nice . lkikhte raho bhai

neelima sukhija arora said...

तुम्हारी बेहतरीन कविताओं में से एक

Udai Singh said...

behtreen kavita hai.