September 1, 2008

चार इमली से खुलता है शहर की किस्मत का दरवाजा

चार इमली भोपाल का वह इलाका है, जहां रहने वालों का बड़ा हिस्सा खास है। यह बात मेरे एक दोस्त ने सुभाष चौक से विट्टन की ओर चलते वक्त दायीं ओर हसरत भरी नजरों से ताकते हुए कही थी। वह अपने पते में चार इमली चाहता था, यानी यहां रहना उसका सपना था, जिसे पूरा हुए अरसा बीत गया, लेकिन ना तो उसके चेहरे पर सपना पूरा होने का सुकून है और ना ही ताकत पा लेने की भ्रामक तकलीफ। उसकी बातचीत में एयरोप्लेन पार्क, बैडमिंटन हॉल और कम्यूनिटी हॉल का जिक्र भी नहीं आता, जो कभी उसके बोले वाक्यों का सबसे जरूरी हिस्सा हुआ करते थे।असल में चार इमली में रहने वालों के चार चेहरे होते हैं। पहला, उनका निजी चेहरा- जिसे वे कभी नहीं दिखाते। दूसरा, शहर की जिम्मेदारी का चेहरा- जिसे हम देख नहीं सकते। तीसरा, चार इमली की हरियाली से भरा खुशनुमां चेहरा- जो सबके चेहरे पर एकसाथ चस्पां होता है और चौथा, नए भोपाल का चेहरा- जिसे देखने वाली आंखें या तो बुझती जा रही हैं या फिर उनमें मोतियाबिंद उतरने लगा है।
भोपाल की धड़कनों को जानने वाले कहते हैं शहर की किस्मत की दरवाजा चार इमली से खुलता है। वे तकरीबन सही हैं। बल्लभ भवन, सतपुड़ा और विन्धयांचल से निकली कई फाइलें, जिनमें खुशहाली की योजनओं का ड्राफ्ट होता है, यहां पाई जाती हैं। जमीन से 80 फीट की ऊंचाई से एकांत पार्क और पांच नंबर झील, जिसे तालाब कहना ही मुनासिब होगा, के बीच का यह हरा-भूरा इलाका अपने पड़ोसियों विट्टन मार्केट, शिवाजी नगर, तुलसी नगर से खूब मेल-मिलाप रखता है। शाहपुरा लेक पर चार इमली अक्सर दिखाई देता है और एकांत पार्क में इसकी सुबहें गुजरती हैं।
बताते हैं कि चार इमली शाम के समय न्यू मार्केट में पाया जाता है और दिन में नए शहर में बने सरकारी दफ्तरों में यह अमन-चैन की योजनाओं में हिस्सेदारी करता है।चार इमली के नामकरण के बारे में जो गप्पे जुमेराती, इतवारा और सदर मंजिल के आसपास तैरती हैं। उनका कथ्य कुछ यूं है- न्यू मार्केट से आगे बढ़ते हुए तुलसी नगर से आगे बसाहट शुरू हुई, तो पहाडि़यों के कारण जंगल काटने में दिक्कत आने लगी। तब आज के नूतन कॉलेज के सामने की पहाड़ी पर चार इमलियां हुआ करती थीं। वे काटे नहीं कट रही थीं और काफी समय यह इलाका उन चार इमलियों की सुरक्षा के सहारे शहर की बदलती रंगत के खिलाफ खड़ा रहा। फिर मशीनों के सहारे वे इमलियां काटी गईं और शहर शाहपुरा लेक की ओर बढ़ा। अपनी मुश्किलों को खत्म करने की यह शैली प्रशासनिक क्षमताओं से मिलती-जुलती थी, सो चार इमली के पहले निवासी इसी धारा से आए, जो अब तक इनकी बसाहट का बड़ा हिस्सा बने हैं।

5 comments:

Dipti said...

हो सकता है एक कहानी ये भी हो। मुझे जो पता है वो मैं आपको बता दूँ। शहर जब यहाँ तक नहीं बसा था तब यहाँ के घने इमली के पेड़ों में चोर छिपा करते थे। जिसके चलते ये चोर इमली कहलाता था। बाद में यहाँ आला अफ़सरों को बसा दिया गया। जिन्हें आप यूँ सीधे-सीधे चोर नहीं कह सकते हैं। तो हो गई ये चार इमली...

अबरार अहमद said...

भई वो पुराना सचिन नजर नहीं आ रहा। यह तो कोई और ही है। जनाब पूरा भोपाल नाप दोगे क्या।

avishri said...

सचिन जी,
1/९ के बाद कोई नई post नही है आख़िर ऐसा क्यों ? वैसे चार इमली और भोपाल के दूसरे इलाको के बारे में आपका ज्ञान कबीले तारीफ है. लेखन भी हम जैसे नए पत्रकारों को प्रभावित करता है. क्या घुम्मकड़ पत्रकार कहीं खो गया या व्यस्त है. इबारत में अख़बारों में दौड़ लगाते पत्रकारों के बारे में लिखें, इंतज़ार रहेगा.

शेष अभी तक शुभ
आपका, और किसी का नहीं

अवि श्री

BrijmohanShrivastava said...

तुम तो भईया ,हमारे ही यहाँ के निकले /सच है घुटना पेट की तरफ ही झुकता है =अपनों को कितनी जल्दी पहिचाना आपने ,बडा अच्छा लिखते हो ,तुम्हारे वारे में सुन ही नहीं पाया /नौकरी के सिलसिले में १२ साल से बाहर हूँ = अब खूब जमेंगी तुम्हारी और हमारी =भोपाल वावत अच्छा लिखा =और कविताएं वगेरा भी करते हो क्या =बंधू मेरा ई मेल बडा गडबड हो गया है गलती से गूगल और याहू में अलग अलग = अब जा देखो तुम के दोई जने नई बदल रए न तो जो गूगल बारो बदल रओ न याहू वारो =वैसे मेरी आई दी जे फे पत्र वगेरा आथें वा है Thesis_brij@yahoo.co.in

प्रदीप मानोरिया said...

बृजमोहन जी के ब्लॉग से आपके ब्लॉग को पाया आपका आलेख पढा सुंदर है मजेदार भी मैं भी आपके मुंगावली के जिला मुख्यालय अशोकनगर से हूँ . मेरे ब्लॉग पर पधारें और रोज़ ताजी कविताओं का आनंद लें