April 11, 2009

मैं, जो वोट नहीं कर सकता इन्हें

दोपहर में हरिओम राजोरिया से बात हो रही थी. फिर शाम में हुई और फिर अभी देर रात. एक बेचैन कवि से बातचीत करने से अमूमन बचता हूं, लेकिन हरिओम फिर फिर सामने आते हैं. अपनी असहमतियों, बेचैनियों और सवालों के साथ. जो हरिओम को जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि वे हमारे समय के उन विरले कवियों में से हैं, जिनके रचनाकर्म से उनके जीवन का अंदाजा लगाया जा सकता है. यानी उनकी रचना और जीवन में दूरी तकरीबन न के बराबर है. हरिओम की रचनाएं उनके जीवन पर चस्पां है और उनका जीवन, रचनाओं की जुबान है. हरिओम का जिक्र इसलिए कि आज उन्होंने एक कविता लिखी है. अपनी नागरिक जिम्मेदारी की पहली शर्त पर. यह एक नागरिक का मत है, जो बिना किसी लागलपेट के जानता है कि उसे किनको वोट नहीं देना है... तो लीजिए ये कविता...

एक नागरिक

कठोरता जिनके चेहरों से चूती है
जो कठोर और कड़े निर्णय लेते हैं हर हमेशा
रहते हैं कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच
पहनते हैं झक सफेद कपड़े
और एक परिंदा भी
बीट नहीं कर सकता जिनके कपड़ों पर
क्षमा करना मैं उन्हें वोट नहीं कर सकता

मैं चमचमाती सड़कें देखकर वोट नहीं करता
क्योंकि वे तो बनी ही हैं
हमारे पैसों और पसीने से
मैं लकदक अटारियां और अट्टालिकाएं देखकर वोट नहीं करता
क्योंकि हम जैसे लोग उनमें कहां रहते हैं
मैं त्रिशूल और तलवारें देखकर वोट नहीं करता
क्योंकि उनका अपना कोई धर्म नहीं होता
आपका नाम ही अगर विकास कुमार है
आप सचमुच मुझे क्षमा करना
मैं किन्हीं विकास कुमार को वोट नहीं करता

जो न हुआ अपनी जात का
क्या होगा वह अपने बाप का?
आप मुझे क्षमा करना
ऐसी कहावतें गढ़ने वालों को
मैं अपना वोट नहीं कर सकता!!!

7 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया रचना प्रेषित की है।बधाई।

Udai Singh said...

सचिन भाई
सच बताऊं तो यह कविता अदभुद् है खासतौर पर हरिओम राजोरिया जी ने जिस तरह से इन सफेदपोश डाकुओं को परिभाषित किया है वाकई काबिलेतारीफ है वैसे वोट देना तो हमारा राजनैतिक अधिकार है लेकिन..... मानना है कि यदि एक वोट से कोई जहरीला दरख्त तैयार हो रहा तो.......... जैसे परिंदे उनके कपडों पर वीट करने से ऐतराज करते है वैसे हमें भी इन परिंदों से सीख लेनी चाहिए

Bahadur Patel said...

bahut badhiya kavita padhawane ke liye dhanywaad.
hariom bhai ko jabase kavita ki samajh paida hui tabase padh raha hoon.
bahut tikhi kavita to hai hi, lekin kam shabdon me mahtvpurn va bahut sa kah dena aur undertone me yah hariom bhai ki khasiyat hai.
hariom bhai ko bahut-bahut badhai.

श्यामल सुमन said...

प्रत्याशी गर न मिले मत करना मतदान।
सत्तरह नम्बर फार्म को भर देना श्रीमान।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

पशुपति शर्मा said...

काफी दिनों बाद लौटे तुम ब्लॉग पर... कविता अच्छी लगी

अशोक कुमार पाण्डेय said...

हरिओम हिंदी के उन बचे खुचे कवियो में है जिनके लिए कविता कैरिअर नही मिशन है. उनकी कविता लगाने के लिए शुक्रिया.
यह कविता फोन पर सुनी थी पढ़कर और आनंद आया.

neelima sukhija arora said...

मैं चमचमाती सड़कें देखकर वोट नहीं करता,
क्योंकि वे बनी ही हैं हमारे पैसे और पसीने से
मैं त्रिशूल और तलवारें देखकर वोट नहीं करता
क्योंकि उनका अपना कोई धर्म नहीं होता


हरिओम जी की कविता पढ़कर यह स्वीकारना ही होगा, उनके लिए कविता मिशन है