April 24, 2009

हिलती हुई दाडी, लचकते हुए जंगल

दोनों ने एक दूसरे के इनबॉक्स देखे. सुबह सुबह. कोई नया मैसेज नहीं था। लडके ने अपनी टी शर्ट उतार दी और रात भर की नींद को सिगरेट के सहारे सुलगाकर हवा में बहाना चाहा. ठीक इसी वक्त लडकी ने सिमोन दा बाउआर की किताब उठा ली. हवा तीखी थी. दोनों के बाल उड रहे थे लेकिन इस वक्त एक दूसरे में उलझ नहीं सकते थे. दोनों के बीच महज एक एसएमएस की दूरी थी लेकिन दोनों ही बचना चाहते थे. यह वक्त भी नहीं था उनका. वे अमूमन शाम में बातें करते थे. लडका बातों का सिरा थामने की कोशिश करता था जो बार बार उससे छिटक जाता था. लडकी अपनी बातों में किसी और को शामिल नहीं करती थी इसलिए छिटकने का सवाल ही नहीं उठता था. अब उनकी जिंदगी का हर हिस्सा अलग अलग था लेकिन फिर भी यह जुडा हुआ था एक दूसरे से, लेकिन किस तरह इसमें शायद आपकी दिलचस्पी न हो. एक अच्छे किस्सागो से सीखी नसीहत की तरह मैं आपकी दिलचस्पी का ख्याल रखना चाहता हूं, लेकिन साथ ही यह भी चाहता हूं कि मैं उस किस्से को पूरा का पूरा आप तक पहुंचाऊं जो इसी वक्त में घटा है, हुआ है, बिना किसी की दिलचस्पी के बिना किसी सलाह के.मैंने अभी जिनका जिक्र किया वे इस हहारते समय के दो जिस्म थे, जिनकी सांसें, एक दूसरे में इस कदर मिली हुई थीं कि उनमें जो फर्क था वह एक आंख से नजर भी नहीं आ सकता था. लेकिन अफसोस, ये आप भी कर सकते हैं, वे साथ साथ नहीं थे. दोनों की अपनी दुनिया थी जिसमें दूसरे की कोई जगह नहीं थी. पहली नजर में जल्दबाजी में कहा जाए तो लडके की राजनीति से लडकी इत्तेफाक नहीं रखती थी और लडकी की भावुकता से लडके को डर लगता था। लेकिन बात इतनी सतही नहीं थी. लडका भावुक था अपनी पूरी राजनीतिक समझ के साथ और लडकी अपनी पूरी भावुकता में दुनिया को बेहतर बनाने का स्वप्न देखती थी. लडके के लिए लडकी की बातें समझने का एक सिरा पॉलिटिक्स से होकर गुजरता था जहां उसके अपने खांचे थे, लेकिन लडकी के पास सुभीता था, भावुकता का. वह दुनिया की सबसे जरूरी कार्रवाई को समझना चाहती थी, लेकिन उसकी रफ्तार वह नहीं थी जो हमारे समय की थी. कई बार लडके की बातें समझ न आने पर लडकी सिर्फ मुस्कुरा देती थी और इसी क्रम में लडके की हंसी भी खुल जाती थी. तब वह किसी राजनीति से प्रेरित नहीं होता था वह उस समय महज एक प्रेमी होता था। प्रेम में पगी उसकी हंसी का लडकी खूब खूब मजाक बनाती थी और उसकी हिलती हुई दाडी को लचकते हुए जंगल का रूपक देती थी। लडका उसकी बातों को सुनता तो था लेकिन महज इन्हें वक्ती कीमियागीरी मानकर चुप्पी साध जाता था. लडकी से वह किसी भी गंभीर बयान की अपेक्षा नहीं करता था लडकी भी अपनी तई मानकर चलती थी कि उसकी जरूरत लडके को महज अपने अकेलेपन से पार पाने की है. यहां आप अपने चश्मे से झांकते हुए यह समझ रहे होंगे कि लडका जरूरत से ज्यादा बदकिस्मत था जो अपने प्रेम की लकीर को पूरा नहीं देख पा रहा था, लेकिन ऐसा है नहीं. लडका उम्मीद की हवा से बहुत दूर था और जानता था कि किसी एक के पास होने का कोई अर्थ नहीं जब तक कि वह जो दूर हैं उनके लिए जगह बनाने की ईमानदार कोशिश न करे. ....जारी

3 comments:

डॉ .अनुराग said...

हाईटेक राजनेतिक प्रेम है जी....हाईटेक इसलिए की एस एम् एस सन्देश वाहक है....राजनैतिक ....दोनों प्रेम में माहिर है

shiv sagar said...

Sir, it’s nice to speak on such issue but result is Zero, it’s a dilemma of our country in present perspective. Such big issue not only bother single person but shakes entire Nation. But keep on converse over shaking values.
--Kindly visit your old well-wisher too I invite you. Your shiv sagar, Meerut

akanksha said...

Kafir-e-ishqam musalmani mara darkaar neest
Har rag-e mun taar gashta hajat-e zunnaar neest