May 10, 2009

मंदी और भारत की दोहरी पहचान

डॉ जया मेहता देश की जानी मानी अर्थशास्त्री हैं. आर्थिक मंदी के हालिया दौर को वे बदलाव की एक नई संभावना के तौ पर देखती हैं. हाल ही में उन्होंने पत्रिका के लिए विशेष लेख लिखा, जिसमें मंदी के कारणों की पडताल करते हुए मौजूदा और आनी वाली भयावहता का खाका दिया. फिलवक्त जब मंदी के बारे में गफलतों की बाढ आई हुई है, यह लेख पूंजीवाद की इस बीमारी के जीवाणुओं पर बारीक नजर डालता है. साथ में लगा कार्टून हमारे साथी आशुतोष का है, जिनकी हुनरमंदी का महज कायल हुआ जा सकता है.

वैश्विक वित्तीय संकट में देश की 80 फीसदी जनता का कोई सहभाग नहीं है, लेकिन इसके दुष्प्रभाव उस पर पुरजोर पड़ेंगे
दोहरी पहचान के चलते हमारी राजनीति और आर्थिक नीति शीर्ष पर बैठे 10 से 15 फीसदी लोगों को वित्तीय संकट और आर्थिक मंदी से बचाने में व्यस्त है। 80 फीसदी जनता पर पड़ने वाले प्रभाव से सरकार निरपेक्ष है।
आजाद हिंदुस्तान के 60 वर्ष से भी ज्यादा के आर्थिक विकास से एक चीज जो हमने हासिल की है वह है- देश की दोहरी पहचान। जहां तकनीकि और आर्थिक स्तर पर चंद हिस्सों में इतनी तरक्की हुई कि हम विश्व पटल पर किसी से भी मुकाबला कर सकते हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी 80 फीसदी जनता 20 रुपए से कम में प्रतिदिन निर्वाह करती है। और वह हालिया विकास से पूरी तरह अछूती रही है। सितंबर 2008 से जिस वैश्विक वित्तीय संकट की बात चारों तरफ फैली है, हमारे देश की 80 फीसदी से ज्यादा जनता का न तो इसमें सहभाग है, न ही उनका इस पर कोई नियंत्रण है और न ही कोई जानकारी। फिर भी विडंबना यह है कि विश्व में आए इस वित्तीय संकट और उससे जारी आर्थिक मंदी के दुष्प्रभाव इस पर पुरजोर पड़ेंगे।
वैश्विक वित्तीय संकट और आर्थिक मंदी के संदर्भ में भारत सरकार ने जो मोटे कदम उठाए हैं, वे इस प्रकार है। लेहमन ब्रदर्स के दीवालिया होने से मचे हडकंप के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने विश्वास दिलाया कि भारत की अर्थव्यवस्था पर इस संकट का कोई असर नहीं पड़ेगा। अमेरिकी बैंकों को दीवालिया करने वाली टॉक्सिक सिक्योरिटीज से हमारी बैंकिंग व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित है। बहरहाल, विदेशी निवेशकों ने तेजी से अपना फंड भारत से निकाला। 2007-08 में फॉरेन इंस्ट्टीट्यूशनल इन्वेस्टमेंट के तहत 20.3 बिलियन डॉलर भारत की अर्थव्यवस्था में आए अप्रैल से अक्टूबर 2008 के दौरान इसमें से 11.1 बिलियन डॉलर निवेशकों ने बाहर निकाले। इससे सेंसेक्स, जो 8 जनवरी 2008 को 20,873 की ऊंचाई पर था, अक्टूबर 2008 में गिरकर 10 हजार से भी नीचे पहुंच गया। रुपए के विनियम मूल्य को गिरने से बचाने के लिए आरबीआई ने 25.8 बिलियन डॉलर की बाजार में बिक्री की फिर भी यह फरवरी 2008 के 39.26 रुपए प्रति डॉलर से गिरकर अक्टूबर 2008 में 48.86 रुपए हो गया। भारतीय ऋण व्यवस्था की तरलता कायम रखने के लिए आरबीआई ने रेपो रेट और सीआरआर की दरें कम कीं और वित्तीय व्यवस्था में 390 हजार करोड़ रुपए डाले। जहां तक राजस्व नीति का सवाल था केंद्र सरकार ने दिसंबर 2008 और जनवरी 2009 में दो फिस्कल इस्टेम्यूलस पैकेज घोषित किए, जो जीडीपी के 3 फीसदी के बराबर था। चुनाव घोषित होने के बाद सरकार पूर्ण बजट पेश करने की अधिकारी नहीं रही और अंतरिम बजट में ठोस नीतिगत कदमों की गुंजाइश नहीं थी। फिर भी 2007-08 में जीडीपी के 3.1 फीसदी रहे फिस्कल डेफिसिट को बढ़ाकर 7.8 फीसदी किया गया। इसके अलावा जी-20 की दो सभाओं में भारत ने भाग लिया। खेद की बात है कि इनमें भारत ने तीसरी दुनिया के देशों का प्रतिनिधित्व करने के बजाय अपनी उभरती नई आर्थिक पहचान प्रतिष्ठित करने की कोशिश की।
वैश्विक स्तर पर फाइनांस और हाउसिंग लोन का बुलबुला फूटने के बाद किए जा रहे प्रयत्नों का मुख्य उद्देश्य विकसित देशों की सरकार द्वारा वित्त व्यवस्था में तरलता डालकर इसे थोड़े बहुत बदलाव के साथ चलाने का है। अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्था अपने प्रयत्नों में अब तक सफल नहीं हुई हैं और वित्तीय संकट का प्रभाव उत्पादन प्रक्रियाओं और रोजगार के आंकड़ों पर साफ-साफ दिखाई दे रहा है। ये सब अर्थव्यवस्थाएं मंदी में घिरी हुई हैं। 2008 की आखिरी तिमाही में अमेरिका की विकासदर 6 फीसदी ऋणात्मक रही, तो यूरो जोन में यह 1.5 फीसदी ऋणात्मक रही। जापान में तो हालात और भी भयावह हैं, वहां इस दौरान अर्थव्यवस्था की विकासदर 12 फीसदी ऋणात्मक है। हिंदुस्तान और चीन के संदर्भ में कहा जा रहा है कि यहां मंदी की बात न करें, यह मंदी नहीं, केवल स्लो डाउन है। भारत में विकास की दर 9 फीसदी से दो या तीन फीसदी कम हो जाएगी।
अखबार की सुर्खियों में इस स्लो डाउन के शिकार लोगों की खबरें लगातार आ रही हैं। जैसे-मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स को जॉब न मिलना, जेट एयरवेज की छंटनी, आईटी और बीपीओ सेक्टर में निराशा। जो खबरें हाशिए पर हैं उनमें कानपुर के चमड़ा उद्योग में काम कर रही छोटी-छोटी निर्यात इकाइयों और उनमें काम कर रहे न्यूनतम वेतन तक न पाने वाले लोग, सूरत के जेम और ज्वैलरी उद्योग के ठप होने से बेरोजगार हुए लोग, केरल का वह श्रम जो गल्फ गया था और अब बड़ी संख्या वापस आ गया है और देश के विभिन्न हिस्सों में रेडिमेड उद्योग से जुड़ी शोषित महिलाओं के रोजगार पर भारी हमला आदि आदि।
इसके अलावा हिंदुस्तान के कृषि क्षेत्र में कार्यरत 60 फीसदी श्रम वर्ग भी वैश्विक मंदी से बचा नहीं रहेगा। उदारीकरण के तहत कृषि वस्तुओं पर आयात-निर्यात के प्रतिबंध हटा दिए गए और विश्व बाजार में कृषि वस्तुओं के मूल्य में तेजी से आने वाले उतार-चढ़ाव से भारतीय किसान सीध्ो प्रभावित हुए। अब यदि आर्थिक मंदी के चलते या स्वाइन फ्लू की वजह से ही सोयाबीन (जिससे पशुओं का आहार बनता है) की कीमतें तेजी से नीचे गिरती हैं, तो मालवा का एक एकड़ की जमीन वाला किसान रातोंरात दीवालिया हो जाएगा। इसी तरह मंदी का असर कपास, गेहूं, चावल, गन्ना आदि के मूल्यों पर भी पड़ेगा। नवसाम्राज्यवाद के इस दौर में गरीब देशों के सस्ते श्रम की बुनियाद पर अमीर वर्ग के उपभोक्तावाद को असीमित बढ़ावा दिया गया। मंदी के दौर में अमीर वर्ग के कुल उपभोग में थोड़ी सी भी कमी आने से बहुत सारी गरीब जनता की आजीविका क्षण भर में तहस-नहस हो जाती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की दोहरी पहचान के चलते जहां हमारी राजनीति और आर्थिक नीति शीर्ष पर बैठे 10 से 15 फीसदी लोगों को वित्तीय संकट और आर्थिक मंदी से बचाने में व्यस्त है और एक तरह से संतुष्ट भी है कि संकट इतना बड़ा नहीं है, जिससे निपट न सकें। वहीं दूसरी ओर इस 80 फीसदी जनता पर पड़ने वाले प्रभाव से सरकार निरपेक्ष है। इस तबके पर पड़ने वाले असर का सही और विस्तृत आकलन भी अब तक नहीं हुआ है।
हर कोई यह जानना चाहता है कि यह आर्थिक संकट नियंत्रण में आएगा तो कब तक? इस बारे में यकीन के साथ कोई दावा करना किसी भी विशेषज्ञ के लिए मुमकिन नहीं है। आईएमएफ ने नबंवर 2008 में पूरी दुनिया के देशों की विकासदर के जो पूर्वानुमान लगाए थे, उसके आंकड़े चार महीने के भीतर ही संशोधित करते हुए घटा दिए हैं। हो सकता है मौजूदा प्रयत्नों से यह संकट काबू में आ जाए। नतीजतन यह पूंजीवादी ढांचा एक नई शक्ल के साथ कुछ दिनों के लिए निर्बाध रूप से चल पड़ेगा। लेकिन ऐसी स्थिति में भी जो शक्ल पूंजीवाद अख्तियार करेगा, उसमें इन 80 फीसदी लोगों के लिए मौजूद विकल्प इनके हालात बद से बदतर ही करेंगे।
यह भी संभव है कि इस संकट पर काबू पाया ही न जा सके। दुनिया 1930 से भी ज्यादा गहरी और कठिन मंदी में घिर जाए। जिससे उबरने के लिए पूंजीवाद ने फासीवाद और द्वितीय विश्व युद्ध का सहारा लिया था, तब क्या ये माना जाए कि मौजूदा आर्थिक संकट को खत्म करने के लिए पूंजीवाद दुनिया को फिर एक महायुद्ध की ओर धकेलेगा। उसकी अनुगूंजें हम पिछले दो दशकों में इराक, अफगानिस्तान, फिलिस्तीन में सुनते आ रहे हैं। यानी जो लोग फिलवक्त भूख से मर रहे हैं। वे बारूद और बमों से मारे जाएंगे।
सवाल यह है कि क्या इन अधिसंख्य लोगों के पास वैश्विक आर्थिक संकट के हल होने या न होने- दोनों ही स्थितियों में सिर्फ एक ही विकल्प मौजूद है कि वे बेजान चीजों की तरह बेमौत मारे जाएं? या फिर वे इकट्ठे होकर इस व्यवस्था को यह चुनौती दे सकते है कि हमारी जिंदगी का फैसला चाहे वह हार में हो या जीत में हमारी भागीदारी के बगैर नहीं होगा। इतिहास गवाह है कि पूंजीवाद जब भी संकट में आता है तो एक वैकल्पिक न्यायपूर्ण व्यवस्था की सरंचना साथ लेकर आता है।

5 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सही विश्लेषण, दिशा दर्शक आलेख।

Udai Singh said...

लेख बहुत सुंदर है
जया जी ने जिस वैकल्पिक व्यवस्था का जिक्र किया है मेरे खयाल से वह व्यवस्था जरूर आएगी
आशुतोष जी कार्टून वाकई बहुत अच्छा है

नदीम अख़्तर said...

सॉरी, लेकिन मुझे पूंजीवाद कहीं संकट में नहीं दिखायी दे रहा है। हर जगह पूंजी वाले ही फल-फूल रहे हैं और निचले क्रम के लोगों को पूंजीपरस्तों की चाबुक का सामना करना पड़ रहा है। निचले क्रम के लोगों को बताया जा रहा है कि अभी रिसेशन है, कर्मचारियों की छंटनी के अलावा प्रबंधन के पास कोई विकल्प नहीं है। यही कह कर कई कर्मचारियों को निकाल दिया जा रहा है। दूसरी ओर इसी मंदी में प्रबंधन के प्रमुख पदधारी दो लाख से 20 लाख तक मासिक तन्ख्वाह उठा रहे हैं। दरमाहे में अंतर की बात तो समझ में आती है, लेकिन ग़रीब कर्मचारी को काम से निकाल कर अपनी संदूक सुनहरी करने की बात साम्राज्यवादी प्रतीत होती है।

सचिन .......... said...

नदीम भाई आप सही कह रहे हैं. जया भी यही कह रही हैं, कि इस व्यवस्था में महज 15 फीसदी लोगों के सुख के लिए बाकी लोगों को पेट काटना सिखाया जा रहा है. पूंजीवादी स्ट्रक्चर की दिक्कत ही यह है कि वह बिना मुनाफे, तगडे मुनाफे के नहीं चल सकता. दूसरी बात कि वह मुनाफे में से मजदूर को हिस्सा नहीं देगा. तब वह मजदूर का वाजिब हक भी कम करके देगा, लेकिन जब वह संकट में आएगा तो उसका खमियाजा मजदूर को ही भुगतना पडेगा. मीडिया तो क्लासिक उदाहरण है इस बात का.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

zaroorii aalekh