May 26, 2009

खबर की कीमत पर विज्ञापन कौन छाप रहा है

इस समय की सबसे ज्यादा ऊबाऊ बहसों में से एक अखबार की गुणवत्ता कम होने की बहस है। दो अखबारी मित्र मिलें, कोई जान-पहचान वाला, किसी सरकारी अफसर से मिलो या किसी राजनीतिक से- सभी एक स्वर में मानते हैं कि अखबार से खबरें गायब हुई हैं। खासकर हिन्दी अखबारों में। तो इन अखबार में क्या छप रहा है? जवाब होता है- विज्ञापन। समझ नहीं आता जब सबको लगता है कि खबरें गायब हैं, यानी आनी चाहिए, तो वे कौन से मुट्ठीभर लोग हैं, जो खबरें दबा देते हैं और विज्ञापन लगा देते हैं? इसे मेरा भोलापन कहिए, सचमुच ये विज्ञापन बुद्धि में नहीं घुसता

चलिए इतना तो तय है कि विज्ञापन ने खबरों को प्रभावित किया है। थोड़ा पीछे नजर दौड़ायें तो दिखता है कि जिन खबरों की दम पर आठवें दशक के उत्तरार्ध में हिन्दी अखबारों ने बड़े विज्ञापनदाताओं को अपनी ओर आकर्षित किया था, अब वे विज्ञापन के लिए खबरों से समझौता करने लगे हैं। सातवें दशक के पहले तक अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले हिन्दी में विज्ञापन न के बराबर थे। यहीं नजर टिकाये रखें तो दिखता है कि इमरजेंसी के बाद दो घटनाएं एक साथ घटीं। हिन्दी अखबारों की खपत तेजी से बढ़ रही थी और अंग्रेजी अखबार दूरदराज के इलाकों से गायब थे। 1979 में पहली बार हिन्दी अखबारों की प्रसार संख्या अंग्रेजी से ज्यादा हुई और 99 तक आते-आते यह चौगुनी हो गई। उसके बाद थोड़ा ठहराव आया, लेकिन वह वक्ती मंदी रही और अब आलम यह है कि हिन्दी की प्रसार संख्या अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले 7 गुना ज्यादा है। हालांकि इस अनुपात में विज्ञापन नहीं बढ़े। यानी विज्ञापन का ज्यादा संबंध पाठकों की क्रय शçक्त से है, न कि प्रसार संख्या से। आज भी अंग्रेजी पाठकों की कुल क्रय शक्ति हिन्दी पाठकों के मुकाबले 15 गुना ज्यादा है। तो यह तो है विज्ञापन के खेल का ऊपरी परिदृश्य।

इसे उलट-पुलटकर देखने पर पता चलता है कि 1991 हिन्दी मीडिया के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन का दौर रहा। यह उदारीकरण का पहला साल भी था भारत में। और इसी समय हॉरलिक्स की एक विज्ञापन श्रृंखला आई थी हिन्दी के अलावा उçड़या, बांग्ला, असमी और मलयालम में। इस विज्ञापन में भाषा और उसकी संस्कृति को ध्यान में रखकर उत्पाद के बारे में बताया गया था। सभी विज्ञापनों का आधार था घर-परिवार, सुरक्षा और स्वास्थ्य। हॉरलिक्स 40 के दशक से अपना विज्ञापन दे रहा था, लेकिन विभिन्न भाषाओं में वह पहली बार लोगों तक पहुंचा। यही वह दौर था, जब हिन्दी मीडिया ने पहली बार विज्ञापन के केक का स्वाद पूरी तरह चखा और यही वह दौर था, जब उदारीकरण की आंधी में अखबार-पत्रकारिता की बहसों में मूल्य, नैतिकता, ईमानदारी, लोकहित आदि शब्द नकार दिए गए। शुरुआत में यह विज्ञापन भारतीय शील और संकोच की भाषा में आए और फिर कंडोम की छतरी लगाकर अपना लबादा उतारते गए और अब तकरीबन पूरी नंगई के साथ अखबारों में पसरे हैं। तो क्या उदारीकरण और विज्ञापन का कोई रिश्ता है? विज्ञापन पूंजीवाद का अग्रदूत है तो फिर उदारीकरण विज्ञापन की नाव होना चाहिए?

बहरकैफ, रॉबिन जेफ्री के शब्दों में इस आंधी के बाद अखबार निकालना उसी तरह हो गया कि हर रोज आपको पसंदीदा खाना मिले और उसे खाने के लिए पैसा अलग से। विज्ञापन के इस दौर का प्रभाव लोगों पर पड़ना ही था और वह पूरी ताकत से पड़ा। पहली बार अखबार आकर्षक हुए और उन तक आम आठक की पहुंच बनी, लेकिन एक सीमित दायरे में अब पाठक की रुचि अखबार तय कर रहे थे और अखबार की सोच विज्ञापन से तय हो रही थी। अखबारों ने लोगों को विरोध और सुविधा का दोहरा भ्रम दिया, यानि अगर वे असंतुष्ट हैं, तो एक व्यवस्था के तहत विरोध करें, उनकी बात सरकार तक पहुंचेगी, नतीजतन एक पूरी की पीढ़ी आराम पसंद और आलसी हो गई। यह पीढ़ी जमीन पर विरोध नहीं कर सकती। कागज पर विरोध करना सीख गई है।

विज्ञापन के संबंध में अखबार मालिकों में 20वीं शताब्दी में कुछ दुविधा दिखाई देती थी। एक दौर में विज्ञापन को क्वअभारतीयं और क्वराष्ट्रविरोधीं भी कहा गया। इससे उन सामाजिक-आर्थिक बदलावों की आहट मिलती है, जिन्हें कुछ लोग रोकना चाहते थे और कुछ इससे लाभ उठाना चाहते थे। दूसरी तरफ विज्ञापन अपनी स्वच्छंद आजादी चाहते थे, जो उन्हें मिल गई।

इसी क्रम में एक बात और ध्यान देने लायक लगती है। जवाहरलाल नेहरू भी गांधीजी की तरह विज्ञापनों को नापसंद करते थे, पर थोड़ा अलग संदर्भ में। इंडियन सोसायटी ऑफ एडवर्टाइजर्स को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि "विज्ञापन लोगों को उपभोग की ओर प्रेरित करते हैं और जिस चीज को लोग नहीं खरीदना चाहते हैं, उन्हें वे चीजें खरीदने के लिए बाध्य करते हैं।"

मेरे एक साथी हैं, यहीं इंदौर में, वे कहते हैं- "आदमी से कोई ऐसा काम नहीं कराया जा सकता, जो वह नहीं करना चाहता"
लेकिन दोस्त उसका मन तो बदला जा सकता है। विज्ञापन यही करता है, आपके दिमाग में बैठकर पूरी सोच बदल देता है। तो चलिए मिलते हैं "आफ्टर अ लांग ब्रेक"!!!!

तब तक आप मुझे विज्ञापन का यह जाल समझाएं। वैसे अश्विनी पंकज ने इसे समझने के लिए मुझे यह लिंक भेजा है। आप यहां क्लिक करके देखिए कौन नियंत्रित कर रहा है यह खेल.

9 comments:

श्यामल सुमन said...

अच्छा आलेख है सचिन जी खासकर सामयिक विश्लेषण। वाह।।

जिसकी कार सर के ऊपर से गुजरे उसे सरकार कहते हैं।
विज्ञापन के बाद बचे जगह की खबर को अखबार कहते हैं।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

काजल कुमार Kajal Kumar said...

साहब, सच तो ये है कि हम विज्ञापकों की कीमत पर खबरें पढ़ रहे हैं, वर्ना लाला लोग अखबार छापेंगे क्यों.

आशेन्द्र सिंह said...
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आशेन्द्र सिंह said...
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आशेन्द्र सिंह said...

जय हो ! बहुत ही उपयोगी पोस्ट है . देर से लिखते हो लेकिन बहुत ही उपयोगी और विश्लेष्णात्मक लिखते हो . बधाई

Udan Tashtari said...

विज्ञापन के लिए ही तो अखबार निकालते हैं..बाकी बचा रुतबे के लिए -खबरें तो बोनस में पढ़वा रहे हैं.

ashabd said...

काफी दिनों बाद लौटा हूं बच्‍चू तुम्‍हारे ब्‍लाग पर। क्‍योंकि लगने लगा था, शायद व्‍यस्‍तता के कारण लिखना बंद कर रखा है पर शुकूनदेह रही यात्रा। तर्कपूर्ण बातें वह भी रोजी-रोटी से जुडी। बेचैनी हुई लोगों के कमेंट देखने को...श्‍यामल भाई का कमेंट जच गया...
जिसकी कार सर के ऊपर से गुजरे उसे सरकार कहते हैं।
विज्ञापन के बाद बचे जगह की खबर को अखबार कहते हैं।।
मजा बांध गुरु...लगे रहो...फ‍िर जल्‍दी लौटता हूं।

Ajit said...

क्या बात है, नंगी तस्वीर दिखाई तुमने पत्रकारिता और विज्ञापन के सम्बन्धों की.
कोई लेख किसी कमअक्ल टाई और फीता कसे हुए मैनेजमेंट के किसी चिकनी सूरत वाले एक्ज्युक्यूटिव ने अंटका दिया क्या..?
कमेंट डिलीट मत किया करो, सन्देह होता है. बेहतर है कि कमेंट मॉडरेशन के बाद पब्लिश करो.

neelima sukhija arora said...

suman ji ka vishleshan thoda theek lagta hai, waise bhi khabren to ab bonus mein padne ko milti hain.