अभिषेक बच्चन को यदि हॉलीवुड जाना हो तो उन्हें शायद अमिताभ के अलावा किसी से सलाह नहीं लेनी पडेगी... लेकिन आज टीवी पर देखा कि लारा दत्ता के कारण अभिषेक हॉलीवुड नहीं जा पा रहा है.... बात तो बहुत सीधी सी है लेकिन इसकी तकरार को गुलजार ने जिस खूबसूरत अंदाज में पेश किया है वह लाजबाव है.... शुरुआत में लारा पर फिल्माए बोल में से मौसियो मुझे समझ नहीं पड रहा था... साथी मुकेश कुमार ने बताया कि यह फ्रेंच का शब्द है और इसके मायने हैं - महोदय.. बस बात समझ में आ गई.. और गुलजार की शायरी का एक और नायाब मोती तो था ही... सो इस बार पढिए टिकट टू हॉलीवुड....अखियों के नीले, शीश महल में
सोनिए नि सोनिए
बैजा नि बैजा
दो दिन जीना है, इक दिन रेहजा
तेर बिना जीना भी क्या
ओस में घोली, मिंट की गोली
निरी खुशबू बीबा
कन्नी से काटे, मांझे की डोरी
काटेगी तू बीबा
औना पौना ही सही, दिल का
कोना ही सही
लौटा दे मेरा टिकट टू हॉलीवुड
टिकट टू हॉलीवुड, अरे टिकट टू हॉलीवुड, लौटा दे -4
ओस में घोली, मिंट की गोली
निरी खुशबू बीबा
कन्नी से काटे, मांझे की डोरी
काटेगी तू बीबा
जमीं से दो इंच ऊपर
हवा पे चलती है तू
कहीं पैरों का निशां जो पडे तो झुकूं
शहर के उस मोड पर
जहां से तू पास हो
कहे मैं जिंदगी भर वहीं पे रुकूं
नो नो मौसियो, नो नो
इतना सिंपल नहीं
चल दफा हो कहीं
ओ ठेंगे से तेरा ये टिकट टू हॉलीवुड
टिकट टू हॉलीवुड, अरे टिकट टू हॉलीवुड, लौटा दे -4
गिम्मी गिम्मी गिम्मी, गिम्मी माई टिकट
गिम्मी गिम्मी, गिम्मी
माई टिकट
नो नो नो नो नो नो नो नो, मौसियो नो नो
नो नो नो नो नो नो नो,
मौसियो नो नो
माई टिकट टू हॉलीवुड
नो टिकट टू हॉलीवुड
माई टिकट टू हॉलीवुड
नो टिकट टू हॉलीवुड
अखियों के नीले, शीश महल में
सोनिए नि सोनिए
बैजा नि बैजा
दो दिन जीना है, इक दिन रेहजा तेर
बिना जीना भी क्या
ये जिद्दी है सख्त है
बडा ही कम्बख्त है
ये दिल जब जाए जिद से हट ता नहीं
तू रानी है फ्रांस की
मैं बांसुरी बांस की
हमारी सोसायटी में ये चलता नहीं
नो नो मौसियो, नो नो
इतना सिंपल नहीं
चल दफा हो कहीं
ओ लौटा दे मेरा टिकट टू हॉलीवुड
टिकट टू हॉलीवुड, अरे टिकट टू हॉलीवुड, लौटा दे -4
18 January, 2008
लारा दत्ता के कारण हॉलीवुड नहीं जा पा रहे अभिषेक
15 January, 2008
असदउल्लाह खां का पता बता रहे हैं गुलजार
गालिब और गुलजार. यह किसी लेख का शीर्षक हो सकता है.. किसी कविता की शुरुआत भी और किसी अलमस्त गीत की अनुप्रासयुक्त पंक्ति... जो भी हो दोनों लफ्ज हमारी दिल की रंगत के से लगते हैं... गालिब ने बचपन में न समझ आने वाले शब्दों के बावजूद शायरी का मजा दिया तो गुलजार ने अपने से शब्दों को इतने शानदार मुहावरे में ढाला कि चमत्कार की हद तक औचक चेहरे से गीत सुने, नज्में दोहराईं और बातों को बुना.... जब दूरदर्शन पर नसीरउद्दीन गालिब बन कर अवतरित हुए थे, तब उतने भी समझदार नहीं हुए थे कि उन चित्रों को याद भी रख पाते... बस एक हल्की सी याद है कि नसीर किसी बुर्ज पर खडे हैं और पार्श्व से आवाज आ रही थी... आशिकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब/ दिल का क्या रंग करूं खून-ए-जिगर होने तक...
1998 में बीएससी में दाखिला लिया तो पॉकेट मनी भी बढ गई सो जगजीत की आवाज में मिर्जा साहब को घर में ले आए.... मां सुनती और कुडती कि यह क्या सुनता रहता है... तब गालिब की शायरी को कागज पर उतारने की जिद में एक ही गजल को बारहां सुनते थे.... गुलजार का यह इंट्रो तो काफी दिनों तक जुबान पर चढा रहा.... तो गुलजार के लफ्जों में उनका परिचय लीजिए...
बल्ली मारां के मुहल्ले की वो पेचीदा तंग गलीरों
की सी गलियांसामने टाल के नुक्कड पे बटेरों के कसीदेगुडगुडाती हुई पान की पीकों में होता हुआ वाह
वाहचंद दरवाजों पे लटके हुए बोशीदा से कुछ टाट के परदेएक बकरी के ममियाने की आवाजऔर धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अंधेरे ऐसे मुंह जोड के
चलते हैं यहांचूडी बालान के कटरे की बडी बी जैसेअपनी बुझती हुई आंखों से दरवाजे टटोलेइसी बेनूर अंधेरी गली कासिम सेएक तरतीब चरागों की शुरू होती हैएक कुरानी सुखन का सफा खुलता हैअसदउल्लाह खां 'गालिब' का पता मिलता है
चचा गालिब को पढने के लिए यहां क्लिक करें
14 January, 2008
दलित विमर्श के दिलीपियन भाग में एक कंकर
प्रेमचंद हम में से बहुतों के प्रिय कथाकार हैं तो गुलजार हमारे समय के प्रिय गीतकारों में शामिल हैं... दो अपनी तरह के अनूठे शब्द शिल्पी..... एक ने दुनिया के दर्द से रिश्ता बनाकर पूरे समय को कागज में उंडेल दिया.. तो दूसरे ने खुशबू को कैद करके कलम में बिखेर दिया हवाओं के साथ... एक ने तलछट की आवाज को समझ दी तो दूसरे ने मुहब्बत के चांद को घर की खिडकी के बाहर सजा दिया... सोचिए जब ये दोनों मिलें तो क्या हो.... गुलजार ने शिकायती लहजे में प्रेमचंद के पात्रों की तस्वीर बुनी.... और पेश किए लफ्जों के जादूई हिस्से.... आप भी लुत्फ लीजिए और सोचिए कि दिलीप मंडल जी के विमर्श में यह कविता क्या कोई जगह पा सकती है.....
प्रेमचंद की सोहबत

प्रेमचंद की सोहबत तो अच्छी लगती है
लेकिन उनकी सोहबत में तकलीफ़ बहुत है...
मुंशी जी आप ने कितने दर्द दिए हैं
हम को भी और जिनको आप ने पीस पीस के मारा है
कितने दर्द दिए हैं आप ने हम को मुंशी जी
'होरी' को पिसते रहना और एक सदी तक
पोर पोर दिखलाते रहे हो
किस गाय की पूंछ पकड़ के बैकुंठ पार कराना था
सड़क किनारे पत्थर कूटते जान गंवा दी
और सड़क न पार हुई, या तुम ने करवाई नही
'धनिया' बच्चे जनती, पालती अपने और पराए भी
ख़ाली गोद रही आख़िर
कहती रही डूबना ही क़िस्मत में है तो
बोल गढ़ी क्या और गंगा क्या
'हामिद की दादी' बैठी चूल्हे पर हाथ जलाती रही
कितनी देर लगाई तुमने एक चिमटा पकड़ाने में
'घीसू' ने भी कूज़ा कूज़ा उम्र की सारी बोतल पी ली
तलछट चाट के अख़िर उसकी बुद्धि फूटी
नंगे जी सकते हैं तो फिर बिना कफ़न जलने में क्या है
'एक सेर इक पाव गंदुम', दाना दाना सूद चुकाते
सांस की गिनती छूट गई है
तीन तीन पुश्तों को बंधुआ मज़दूरी में बांध के तुमने क़लम उठा ली
'शंकर महतो' की नस्लें अब तक वो सूद चुकाती हैं.
'ठाकुर का कुआँ', और ठाकुर के कुएँ से एक लोटा पानी
एक लोटे पानी के लिए दिल के सोते सूख गए
'झोंकू' के जिस्म में एक बार फिर 'रायदास' को मारा तुम ने
मुंशी जी आप विधाता तो न थे, लेखक थे
अपने किरदारों की क़िस्मत तो लिख सकते थे?'
सवाल गहरा है मुंशी जी ने किस्मत क्यों न लिखी.. और वे नहीं लिख सकते थे तो उसने क्यों न लिखी जो लिख सकने का दावा करवाता है.... मंदिर मंदिर मस्जिद मस्जिद... आज इस पर सोचिए... कल पढिए गालिब पर गुलजार की जादूबयानियां
12 January, 2008
वे बता रहे हैं क्या लिखूं मैं
अभी तीन चार दिन पहले की बात है. एक मित्र का फोन आया.. हाल चाल पूछने के बाद उन्होंने फोन करने का मंतव्य बताया. वे मेरे ब्लॉग पर पिछले दिनों आईं पोस्टों से हैरान थे.. मुझे लताडा... गरियाया और फिर मशविरा दिया कि कुछ बेहतर, ढंग का लिखो.. मैंने मासूमियत से पूछा कि - वह कैसे लिखा जाता है... तो फिर भडक गए और मेरे साथ पूरी ब्लॉग बिरादरी की 'रिश्तेदारी' पर ऐसी तैसी फेरते हुए बताया कि आवाम से जुडे मुद्दों पर लिखो, आंध्रा के किसानों से झारखंड के आदिवासियों और मुंबई के मजदूरों से पंजाब के पैसे तक कई विषयों तक उन्होंने मुझे दीक्षित किया... वे बोल रहे थे और मुझे पहलू वाले चंद्रभूषण जी याद आ रहे थे.. वे कहे थे- "अगर हम कश्मीरी अवाम- चाहे वह मुस्लिम हो या हिंदू- के दुख-सुख में हिस्सेदारी नहीं कर सकते तो हमें कश्मीर का नाम लेने का भी कोई हक नहीं है।"
इस वाक्य में बस विवरण बदल दिए जाएं तो न तो मैं झारखंड पर बात कर सकता हूं न मुझे गुजरात पर बोलने का हक है.. भूख, भ्रष्ट्राचार, गरीबी जैसे सनातन मसलों पर राय देना भी मेरे बस का रोग नहीं है... असल में मैं कमाने, खाने, गंवाने वाला एक निहायत ही "शानदार जीवनशैली" का इंसान हूं और जो लोग मुझसे किसी खास किस्म की उम्मीद लगाए बैठे हैं उनसे मैं नजर मिलाने के काबिल नहीं हूं.. मैं बेहद विनम्र भाव से कहना चाहता हूं कि - महोदय यदि आप मेरी पोस्टों में वह सब नहीं देखते जो मुझसे अपेक्षा की जाती है तो मुझे माफ कर दें... यह मेरी गलती नहीं है कि मैं आपकी समझ से बेहतर ढंग का नहीं लिख रहा... आपने गलत व्यक्ति से अपेक्षाएं पाली हैं.. मैंने कभी किसी तरह का दावा नहीं किया कि मैं अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को निबाहूंगा... अब देखिए न ऊपर दिए गए चंद्रभूषण जी के वाक्य को भी मैं तर्क की तरह इस्तेमाल कर रहा हूं.. इसी तरह का एक तर्क गालिब ने मुहैया कराया है- फिक्र ए दुनिया में सर खपाता हूं मैं कहां और ये बवाल कहां
तो मित्रों आगे से नई इबारतें पर किसी किस्म की उम्मीद के साथ न आएं इसकी पोस्टों में वही मिलेगा जो आप लोगों से सीख रहा हूं यानी होशियारी...
शब्बा खैर
8 January, 2008
हमारे हरिवंश : हमारी जबान, उनकी दास्तान
माफी चाहता हूं दोस्तो. हरिवंश जी पर लिखने के पहले मैंने दावा किया था किया अपने हिस्से के पूरे हरिवंश से आपको रूबरू कराउंगा. लेकिन कलम साथ नहीं देती... गुलजार के शब्दों में लफ्ज उडते फिरते हैं तितलियों की तरह.. बैठते ही नहीं कागज पर... अब क्या कहूं... इस एक शख्सियत में इस एक पर्सनालिटी में इतनी शख्सियतें हैं कि हर बार वे नए से लगते हैं... पत्रकार हरिवंश, संपादक हरिवंश, भारतीय हरिवंश, पिता हरिवंश, दोस्त हरिवंश, साथी हरिवंश, बॉस हरिवंश, अपने हरिवंश, उनके हरिवंश...... सभी हरिवंश... अकेले हरिवंश... 15 पी कोकर इंडस्ट्रीयल एरिया के हरिवंश, ओमशांति अपार्टमेंट, कांके रोड के हरिवंश, .............उनके बारे में लोग लिखते रहेंगे एक इंसान के भीतर छुपी विभिन्न पर्सनालिटी से लोग परिचित कराते रहेंगे... फिलवक्त आप निम्न लिंकों पर उनके बारे में जो ब्लॉग पर पिछले दिनों आया है उसे जान सकते हैं...
यहां एक बात और कह दूं कि हरिवंश जी की पर्सनालिटी पर एक बहुत अच्छा और ब्लॉगों पर आए संस्मरणों से कहीं ज्यादा उनके काम की परेशानियों से रूबरू कराता, उनके अलग होने के कारण दिखाता आलेख पिछले दिनों कथादेश में एक पत्र की शक्ल में छपा था... लिखने वाले हमारे करीबी और हबीबी अविनाश हैं... इस ब्लॉग कथा के साथ उस लेख को भी कहीं से ढूंढ ढांढ कर जरूर पढें... न मिले तो अविनाश जी पर दबाव बनाकर उनसे दिल्ली दरभंगा छुटकी लाइनिया पर पोस्ट करवाएं... फिलवक्त जो उपलब्ध है वह देखें.....
इन सभी लिंक पर मनन करने के बाद जिस एक शख्स से आप बात करना चाहेंगे वह हरिवंश जी ही होंगे... उन्हें 0651-3053126 पर फोन कर सकते हैं... बस ध्यान रखें कि वे अखबारी आदमी हैं और 24 घंटे प्रभात खबर और पत्रकारिता की दुनिया में रहते हैं...
6 January, 2008
किसान-आंखों से गिरती बूंदें हरी होती धरती
लुधियाना में मेरे एक मित्र हैं... विजयन... पता नहीं वह मुझे अपना दोस्त मानते हैं या नहीं लेकिन विजयन से मिली आत्मीयता के बूते उन्हें यह संबोधन दे रहा हूं... वह उस प्रांत से हैं जिसे भारतीय नागर समाज का एक बडा हिस्सा किसी दूसरे देश की शक्ल का सा देखता है... मुझे विजयन से बात करते हुए शर्म भी महसूस होती है और एक अनछुए समाज की भीनी खुशबू का सुकून भी नसीब होता है.. खैर यह जुदा मसला है.. विजयन ने एक ब्लॉग बनाया है नाम है ... परदेश.. यह नाम उन्होंने क्यों रखा और इसके पीछे उनका संत्रास क्या है इन बिंदुओं पर चर्चा फिर कभी फिलहाल विजयन की यह कविता पढिए... इसमें मैंने कोई कांट छांट या भाषाई शुद्धता का रंदा नहीं फेरा.. बस जैसी उन्होंने कही सोची सामने है...
ठीक ही समझा तुमने
कुछ भी तो नहीं हूँ
न आमीर हूँ ही शौक रखता हूँ धन पर
न क्षमतावान हूँ, न ही और कुछ हूँ।
कुछ भी नहीं हेई मेरे पास
महनत के सिवाय
मगर क्या करूं
तुमने मुझे वो जख्म दिए हेई।
जिसे मिटाना चाह कर भी
मिटी नहीं आज तक मेरे दिल से।
अच्छा मजाक उराया हेई तुमने
मेरे गरीबीपन और सीधेपन का
मेरे लाचारी किसान होने का
अच्छा जख्म दिया हेई तुमने हमें।
कुछ भी तो बिगारा नहीं तुम्हारा
झेलता रह अत्याचार चुपचाप
मेरी गुनाह बस इतनी की थी कि
तुम्हारा ओफारों को स्वीकार नहीं ने
मेरे नस्ल हटा कर इस दुनिया से
हमें मर कर हत्या कर
तुम्हारा मकसद पुरा करो
हंसो खूब मुँह खोलकर
मेरे खिलाफ षड्यंत्र रचते रहो
और दुष्प्रचार करते रहो कि
तुम विरोध की मूर्ति हैं।
पर सच यह भी तो हैं
तुम इतना परेशान क्यों हो?
मेरे परिश्रम पर
क्यों करते हो गुटबाजी?
यदि सच्चे हो अपने मन-वतन के
लराई के कई तरीके हैं
इसे बनाओ अपने आपको
चुपचाप बिन कहे, बिन सुने
खींच दो लंबी लकीर मुझसे भी लम्बा
मैं अपने बचाओ के लिए
तलवार भी न उठा सका
बिबस, मजबूर, लाचार मैं
हल को हथियार बनाया
चुपचाप चलाता रहूंगा एइसे।
आशिया लुटा हेई मेरा
इज्जत लुटी हैं तुम्हारी नहीं
फुरसत हो तो झांकी अपने अन्दर
क्या जीया भोग हैं तुमने
सब का जवाब मिल जाएगा अपने आप मैं
बशर्ते पारखी नजर रख सको तो।
मैं एलान करता हूँ सरेआम
इम्तहान ले लो मेरे परिश्रम की
यदि मैं खरा उतरा गया तो
याद रखो! किसान होने की सजा दी हैं तुमने
किस्तों में कत्ल किया हैं मेरी जिन्दगी का
देना होगा तुम्हें लहू का एक-एक कतरे का हिसाब
जिस्म के जितने लहू जले हैं मेरे,
अगर नहीं !
तो सारी दुनिया की उंगली उठेगी तुम पर
और रूह कांप जायेगी तुम्हारी
मुझे कत्ल करने के भय से...
(संप्रति : विजयन इन दिनों दैनिक भास्कर के लुधियाना संस्करण में कार्यरत हैं)
5 January, 2008
निजी पोस्ट जो सार्वजनिक हो गई.... उफ की उठती नहीं ये चाक करके जिगर को
मेरी पिछली पोस्ट पर कई कमेंट आए... कुछ ने इसे स्टंट करार दिया तो कुछ ने फोन करके मुझे दिलासा दी... कुछ लोगों ने मुझे अपने हालात सुनाए तो कुछ इश्क के खता खाए लोगों ने पूरी आधी दुनिया पर बेजा गालियों की बौछार करते हुए उन्हें कठघरे में खडा कर दिया... सबको सुना सबको गुना.. अपनी बात को दिल से कहने पर एक फायदा तो होता है अनचाहे ही सही लोगों के चेहरे पूरे पूरे दिखाई देने लगते हैं.. उनके अंदर का पूरा कालापन सामने आ जाता है ... कमेंट तो काफी कम हैं कई मित्रों ने फोन पर जो जहर उगला है वह यदि पूरा पूरा यहां रख दूं तो कई मर जाएं... .कई वामपंथी चरित्र के वे लोग जिनकी मैं इज्जत भी करता था इस कदर महिला विरोधी है पहली बार पता चला... मुझे ही घिन आ रही है कि उन्हें मैं कभी अपना मित्र कहता था... खैर राजू नीरा ने मुझे चीजों को सार्वजनिक करते हुए उन्हें सार्वभौमिक करने की कला बताई तो अश्विनी पंकज ने चीजों का सिरा पकड कर सही निर्णय लेने की समझदारी से रूबरू कराया... रमेंद्र ने पुराने उदाहरण से हिम्मत दिलाई वहीं मेरे अजीज सत्यप्रकाश चौधरी ने हौसला देने के साथ ही आगे के लिए सबक लेने का जरूरी फलसफा लिया... जितने लोग उतनी समझाइशें.... हैं कितने दीवाने लोग...
इन सभी मित्रों से अलग रंगत की मेरी एक दोस्त जिसे शायद दोस्त से ज्यादा गमगुसार और राजदार कहूं तो ठीक होगा, जिससे मैं कभी मिला नहीं और रोज मिलता हूं.... जिससे मैंने कभी बात नहीं की और हर पल बात करता हूं, ने इस निजी पोस्ट के निजित्व को बचाते हुए मुझे मेल किया उस मेल का मजमून कुछ यूं था-
हमारे एक मित्र हैं चचा साहिर लुधियानवी के भतीजे सचिन। आजकल ये इश्क के मारे हैं। इनकी प्रेमिका है कि इनका फोन ही नहीं उठाती और इक ये हैं कि उसके गम में सारी दुनिया को अपनी प्रेम कहानी बतला दी । लिखते-पढ़ते अच्छा हैं और जब तक प्रेमिका पत्नी बन कर अपना रौद्र रूप ना दिखा दे तब तक कम्यूनिस्ट भी हैं। अपनी नितांत निजी पोस्ट के साथ इन्होंने बेहद खूबसूरत सूर्ख गुलाब का फूल भी लगाया , हम भारतीयों का प्रेम इजहार करने का हजार साल पुराना तरीका ( कम आन यार दैनिक भास्कर के साथ जुड़े होकर भी पुराने आइडिया इट डज नाट वर्क हियर, थोड़े से क्रिएटिव तो हो जाते) शायद अभी जनाब को ये नहीं पता कि प्रेम जब पकने लगता है तो इस गुलाब की पत्तियां झड़ जाती हैं तो सिर्फ कांटे रह जाते हैं। तो सचिन मेरी ये सलाह है- ये किस मकाम पर पहुंचा दिया जमाने ने/ कि अब हयात पे तेरा भी इख्तियार नहीं
मैंने अपनी आदत के अनुसार कुछ जवाब की सी शक्ल का उन्हें भेजा. इसे आप लोगों तक इसलिए पहूंचा रहा कि मैं नहीं चाहता कि मेरी जिंदगी का कोई भी हिस्सा किसी से छुपा रहे.. मेरे जीवन का हर हिस्सा आप जानते हैं कोई न कोई जानता हैं... सच के साथ मैंने जो उन्हें कहा वह यह है......
आलोक धन्वा का नाम सुना होगा और मैं यह मानकर चल रहा हूं कि आप
क्रांति को भी जानती होंगी.. तो मैडम जी हम ठहरे पुराने आशिक पुराने जमाने के आशिक
लेकिन आपने इश्क किया होता तो जानती कि इश्क कितना भी पुराना क्यों न हो वह होता हर पल नया ही है अनूठा कुछ ज्यादा रेशमी कुछ ज्यादा मुलायम... पर क्या करें कम्बख्त
इश्क हर्फ ए अव्वल तो है ही इब्तिदा भी है और इंतिहा भी ... मुझ जैसे आवारा मिजाज के पांवों को इसने जितना भी थामा है मैं उतरा ही गहरा उतर रहा हूं डूब रहा हूं यह अलग बात कि जो डूबा सो पार का ही बेइम्तियाज नतीजा है इश्क...
तो मोहतरमा अगली बात आपकी फोन न उठाने को लेकर है ... मैं ही सवाल हूं अपना मैं ही जवाब हूं उसका के अंदाज ये कुछ यूं है कि किसी फूल से आपने बात की है अगर हां तो उसका नंबर मुझे दे दीजिए और इसी क्रम में बादलों, पहाडों, नदियों, झरनों, हवाओं के साथ मुझे घटाओं के कलरव के कलकल के और हो सके तो वादियों के फोन नंबर भी दे दीजिएगा यानी उन सभी चीजों के जो जीवन को जीने लायक बनाती है खूबसूरत बनाती है हर किसी के लिए उम्मीद, आशा, आप्टिमिज्म का मजबूत सहारा बनती हैं... उन सभी शै से मैं बात करना चाहता हूं और खूब बात करना चाहता हूं... जहां तक प्रेमिका के पत्नी बनकर रोद्र रूप धारण करने की बात है और मेरे कम्यूनिज्म पर आफत की फ्रिक आपको है तो जनाबे मगरिब अभी हमारे फाख्तों का इल्म इतना भी सुरूरी नहीं है कि किसी कमअक्ल कत्थई आंखों वाली की नादानियां हमारी दानां फितरत को बदल दें... हां काली आंखों के जादू में कुछ दिनों तो गुम हुआ जा सकता है लेकिन मेरी जान अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे/ और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा/ राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा....बाकी रही सुर्ख गुलाब को पिछडे जमाने का मानने की बात तो अब
आपकी इस सादा दिली पे तो हम इतना ही कहेंगे कि .... जरा आंख से छूकर जो कह दूं अपने दिल का हाल/ तो गुल ओ आरिज क्या तमाम बदन मुजस्सिम गुलाब हो जाए...... यूं तो कांटों से निबह करना हमें आता ही है किसी वक्त ओ लालाजार में आपकी नम पलकों पे कोई आंसू टिके तो पूछना मेरा पता जानता है कि नहीं.....उम्मीद है इन लफ्जों को अन्यथा न लेंगी... हम शेख फरीद के शिष्य हैं हमें इश्क के लिए किसी नाजनीन के नखरों की तलब नहीं होती हम तो इस दुनिया से प्रेम करते हैं जो हमारी है हमारी रहेगी इसके नाजो अंदाज को किसी पूरी रात का कालापन डरा नहीं सकता और जीते जी ये बेकैफ जमाना हमें जुदा कर नहीं सकता.....
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