August 20, 2007

गीता के साथ न्यूक डील की खबरें

ओशो को पढ रहा था। युद्ध और शांति-गीता का विश्लेषण. टीवी चल रही थी, बताया जा रहा है कि लेफ्ट न्यूक्लियर डील पर सवाल खडे कर रहा है. प्रकाश करात चश्मा ठीक करते हुए कह रहे हैं - न्यूक्लियर समझौता हमें कतई मंजूर नहीं सरकार को इस पर आगे नहीं बढना चाहिए. डी राजा बात आगे बढाते हैं -सरकार और लेफ्ट के बीच सहयोग अब पहले से कम हो जाएगा. असर समन्वय पर भी पडेगा. कांग्रेस अपना पक्ष रख रही है, उसकी तरफ से अभिषेक मनु कहते हैं- सारे मामले में सरकार की नीति राष्ट्रीय हितों को ही सबसे ज्यादा तवज्जोह देने की रहेगी. उधर, भाजपा है वह कहती है सरकार गिर जाएगी. मध्यावधि चुनाव होंगे। वैसे यह लेफ्ट की गीदड भभकी है.

ओशो देख रहे हैं कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं। अर्जुन का द्वंद्व है, उसे खत्म करने के लिए तर्क दे रहे हैं. द्वंद्व अर्जुन के यहां है. वह सोचता हैं. इसलिए द्वंद्व है. दुर्योधन को कोई दिक्कत नहीं है. वह सिर्फ युद्ध चाहता हैं. कोई मरे जिये फर्क नहीं पडता. उसे युद्ध से मतलब. अर्जुन को दिक्कत है, कुटुंब के लोग मर जाएंगे. कृष्ण समझा रहे हैं अर्जुन द्वंद्व छोड, जो आज तेरे पितामह हैं, वे कभी तेरे बेटे थे, शरीर कुछ नहीं होता.

मुझे समझ नहीं आता कृष्ण यह क्यों नहीं कहते कि अर्जुन तू लड बाकी मैं देख लूंगा। अर्जुन मान लेता कहता केशव तुम कहते हो तो लड लेता हूं. मुझे तुम पर भरोसा है. लेकिन कृष्ण समझा रहे हैं. वक्त बरवाद कर रहे हैं. एक ही सवाल को घुमा फिराकर पूछ रहा है अर्जुन. फिर भी जवाब दे रहे हैं. कोई इरीटेशन नहीं है.

न्यूक्लियर डील पर भी लेफ्ट में सवाल हैं यानी द्वंद्व है, उसे दिक्कत है। यह डील होगी तो इसका फायदा किसे पहुंचेगा. किसके हित में है यह डील. भारत को क्या मिल जाएगा इससे. भाजपा में द्वंद्व डील का नहीं है, उसमें सरकार गिरने की चिंता है. क्या वामदल समर्थन वापस लेंगे. यहां भी सवाल है, लेकिन भिन्न किस्म का सवाल है. अपना हित है. बहस में नहीं पडना चाहती भाजपा.

सवाल महज सवाल का है। जहां सवाल होंगे वहां कहीं पहुंचने. कोई तार्किक स्थिति पा जाने के आसार होंगे. सवाल की दिशा क्या है यह भी देखना जरूरी है. अर्जुन का सवाल मारकाट के विरोध में नहीं है फिर भी सकारात्मक है. वह अपनों को मारने से हिचक रहा है. बाकी कोई और तो महज गाजर मूली हैं. कृष्ण इसी भ्रम को दूर कर रहे हैं.

सवाल होना प्रश्नाकुलता होना जीवंत होने सोचने की निशानी है। दुर्योधन के पास सवाल नहीं है. उसे शकुनी, कर्ण ने समझा दिया है. हम हैं न. तुम चिंता मत करो. जीत जाएंगे. अर्जुन बेमन से नहीं लडना चाहता। वह सारी शंकाएं दूर कर लेना चाहता है. मनुष्य ही है वह. दुर्योधन को शंका नहीं है. वह नहीं सोचता आगे क्या होगा. बस लडना है तो लडना है. यह पशुता है. अच्छा बुरा सोचे बिना कुछ भी करते जाना.

तो सवाल हैं लेफ्ट के पास, चिंताएं हैं लेफ्ट के पास, पर कोई कृष्ण नहीं है वहां सिर्फ सवाल है। उनका जवाब किसी के पास नहीं है. कांग्रेस कोई जवाब नहीं देगी वह तो यथास्थितिवादी है. उसे बचाना है. जो कर दिया उसे प्रोटेक्ट करना है. अच्छा बुरा जैसा भी. कर दिया सो कर दिया. अब सवाल होंगे तो भी जाहिर नहीं करना चाहती. दुर्योधन की स्थिति से थोडा बेहतर पर अर्जुन के करीब नहीं.

दिक्कत यहीं हैं सबको राह दिखाने वाला कोई कृष्ण ही नहीं है. इसलिए महाभारत नहीं है यह यह नूराकुश्ती है. कोई कुछ नहीं करेगा सवाल उठेंगे और खो जाएंगे गर्द में. फिर सब मिलकर गाएंगे -देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गई भगवान कितना बदल गया इंसान. क्योंकि सब जानते हैं भगवान तो कहीं है ही नहीं तो सुनेगा क्यों बस यूं ही खेलते रहो - चक दे इंडिया.

August 18, 2007

तेजाब से छिले चेहरे

"मुझे अब कोई स्वीकार करता है और कोई नहीं भी। मुझे बहुत बुरा लगता है. मैं चाहती हूँ कि जो कुछ मेरे साथ हुआ वैसा किसी और के साथ न हो."
यह शब्द दिल्ली में रहने वाली लक्ष्मी के हैं। तस्लीमा नसरीन पर हमले और हाल ही में देवबंद से जारी एक फतवे के साथ इस बयान को रखने पर जो दृश्य बनता है उसमें अर्ध सामंती देश की एक मूंछदार मर्दवादी तस्वीर उभरती है. इसमें महिलाएं महज एक जिंस की तरह हैं, और पुरुष खरीदार अपनी जरूरत के हिसाब से उसका इस्तेमाल करते हैं. जाहिर है इस स्थिति को बदलने के फिलवक्त कोई आसार नजर नहीं आते.
दरअसल लक्ष्मी के इस बयान की कहानी साढे तीन साल पुरानी है। 22 अप्रैल 2004 को लक्ष्मी के चेहरे पर खान मार्केट में कुछ लडकों ने तेजाब फेंक दिया था. तेजाब की झुलस का दर्द तो लक्ष्मी ने सहन कर लिया, लेकिन उस दिन को याद करते हुए आज भी उसकी आंखों में पानी आ जाता है. लक्ष्मी के चेहरे की पाँच बार सर्जरी हो चुकी है और जिस पर लाखों रुपए ख़र्च हो चुके हैं. इसके बावजूद उसे अपना चेहरा छुपाना पडता है. लक्ष्मी पर तेजाब फेंकने वाले दोनों लडके जेल तो गए लेकिन ज़मानत पर रिहा भी हो गए. इस तरह के मामलों में दोषियों की जल्दी रिहाई के लिए भारतीय दंड संहिता भी जिम्मेदार है. दरअसल इस तरह के मामले धारा 320, 226 और 307 के तहत दर्ज होते हैं. इसलिए अभियुक्तों को कड़ी सज़ा नहीं मिल पाती और कई मामले विलंब के कारण बंद ही हो जाते हैं.
यूं देखा जाए तो आधिकारिक आंकडों के अनुसार भारत में 2004 में ऐसी क़रीब 280 घटनाएँ सामने आईं थीं। इस तरह की घटनाओं की सबसे ज्यादा शिकार राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और कर्नाटक की महिलाएं हैं.
बकौल राष्ट्रीय महिला आयोग अध्यक्ष गिरिजा व्यास - "ऐसी घटनाओं की ज़्यादातर शिकार 12 से 20 वर्ष के बीच की महिलाएँ होती हैं"। वे तीन महीनों के भीतर महिला और बाल कल्याण मंत्रालय को इस मसले पर एक प्रस्ताव भेजने वाली हैं जो अभियुक्तों को कडी सजा के साथ पीडिता के पुनर्वास पर भी ध्यान देगा.
और अंत में किश्वर नाहिद की यह कविता
हम गुनहगार औरतें
ये हम गुनहगार औरते हैं
जो मानती नहीं रौब चोंगाधारियों की शान का
जो बेचती नहीं अपने जिस्म
जो झुकाती नहीं अपने सिर
जो जोड़ती नहीं अपने हाथ...
...ये हम गुनहगार औरते हैं
जो निकलती हैं सत्य का झंडा उठाए
राजमार्गों पर झूठों के अवरोधों के खिलाफ
जिन्हे मिलती है अत्याचार की कहानियां
हरेक दहलीज़ पर ढेर की ढेर
जो देखती हैं कि सत्य बोल सकने वाली जबानें
दी गई हैं काट...

August 17, 2007

कोई फर्क नहीं रह गया मेरठ और रांची में


इन दिनों जब घर लौटते हुए अंधेरा अपने पूरे कालेपन के साथ चटचटा रहा होता है, मुझे तुम्हारी याद आती है। इन दिनों जब सुबह जागते समय धूप अपने भरपूर तीखेपन के साथ आंख पर पडती है, मुझे तुम्हारी याद आती है. इन दिनों जब दोपहर का खाना खाने में महज पांच मिनट लगते हैं और कोई मेरी उंगलियों से आ रही सिगरेट की गंध पर भौहें नहीं चढाता, मुझे तुम्हारी याद आती है. इन दिनों जब दिन अपनी पहचान नहीं बताते, दोस्त अपनी परेशानियां छुपाते हैं, बच्चे पानी से बचकर चलते हैं यानी वैसा कुछ भी नहीं होता जैसा जब तुम मेरे बालों को खींचतीं थी तब होता था मैं तुम्हे याद कर रहा हूं.
अपने ही शोर से परेशान मैं, तुम्हे याद कर रहा हूं अपने पूरे स्वार्थीपने के साथ। कितना कितना संभाल लेती थीं तुम मुझे, कितना कितना सहेज लेती थीं तुम मुझे. मैं तुम्हे याद करते हुए याद कर रहा हूं कोकर के उन मकानों को जिनसे धुएं को उठता हुए देखता था मैं तुम्हारी आंखों से, याद कर रहा हूं बरियातु की पहाडी को जहां से गुजरते हुए ठिठक जाती थीं तुम. मैं याद कर रहा हूं यूरोपियन हिस्ट्री का पेपर, फिर मछलीघर, फिर पहाडी मंदिर.
क्या प्रेम में यूं होता है कि डेस्कटॉप पर लगी कोई तस्वीर याद दिला दे तुम्हारी, किसी वॉलपेपर को देखते हुए बिना किसी तुक के मैं पहुंच जाउ लालपुर और वहां से उडकर ठीक तुम्हारे सामने फिरायालाल पर घूमे हम दोनों एक दूसरे के साथ। जैसे हम सोचा करते थे कि रविवार को पूरी रांची में बस प्रेमियों को घूमने की आजादी मिलनी चाहिए. कि जैसे मंगलवार कब्जाए बैठे हैं बजरंगवली हमें भी जता देनी चाहिए रविवार पर अपनी हिस्सेदारी. क्योंकि अब मेरठ और रांची में कोई फर्क नहीं है, प्रेम यहां भी उतनी ही परेशानी में है, जितना वहां था-तुम मुझे याद आ रही हो. तुम्हारी याद में मैं क्या कर सकता हूं सिवाए इसके कि लिख दूं जो मैं तुम्हारे कानों में बेहद की गुफा से निकलती आवाज में कहता था कि - मैं तुम्हे प्यार करता हूं इतना इतना इतना कि बहुत सारा प्यार करता हूं मैं तुम्हे.

August 15, 2007

मैं, मुक्तिबोध, राजेश जोशी और आसमान की सैर

पूरी हकीकत पूरा फसाना-एक
कल
रात तकरीबन साढे 11 बजे मैं और रूपेश आफिस से घर के लिए निकले। मेरे कमरे की गली के मुहाने पर रूपेश ने गाडी रोक दी. लाइट नहीं थी इसलिए सन्नाट में मह मोटरसाइकिल के इंजिन की घरघराहट ही सुनाई दे रही थी. ऊंघते कुत्ते हमें नजरअंदाज कर मुंह फेर चुके थे. मैंने अलविदा के अंदाज में हाथ उठाया और रूपेश ने एक्सीलेटर ले लिया. खरामा खरामा मैं कमरे की और बढने लगा. पांच सात कदम ही चला होउंगा कि देखा गुप्ता जी के मकान के करीब कोई खडा था. बीडी सुलगाए. मैं करीब पहुंचा तो साए ने पूछा - "खत्म कर आए दिहाडी". कोई परिचित ही था, आवाज ने बताया, ऐसा सवाल क्यों. ठंडे अंधेरे में....समझ में आ न सकता हो कि जैसे बात का आधार, लेकिन बात गहरी हो. पास पहुंचा तो देखा मुक्तिबोध ही थे. बीडी खत्म हो गई थी. ठूंठ फेंकते हुए बोले - "पार्टनर नींद तो नहीं आ रही". मैंने इनकार में सिर हिलाया. उन्होंने नहीं देखा. बोले- "भोपाल से आ रहा हूं. कुछ दिन से वहीं था. नौ तारीख को वहां राज्य स्तरीय फुटकर व्यापार बचाओ सम्मेलन था." कहीं गहरे से आती उनकी आवाज में बेचैनी थी - तीस करोड कमजोर भारतीय की रोटी छिनने के डर से उपजी बेचैनी. पांच करोड मेहनतकश भारतीयों के रोजगार पर हमले से उपजी बेचैनी. और 375 लाख करोड के वैश्विक खुदराबाजार को कब्जाने में जुटी वालमार्ट (अमेरिका), मेंटो (जर्मनी) और कैरीफोर (फ्रांस) के खिलाफ कोई ठोस पहल न हो सकने की बेचैनी थी यह.
मैंने मुक्तिबोध का हाथ पकडा और स्वच्छ हवा के लिए हम दक्षिण की ओर उड चले। ग्वालियर के पास उन्होंने कुछ देर रुकने का इशारा किया. शायद वे थक गये थे. हम श्योपुर के करीब उतर गये. सामने से राजेश जोशी आ रहे थे. उनके साथ पत्रकार मित्र आत्मदीप भी थे. राजेश हिरन छाप की झोंक में थे, बोले - "आप जैसे चिकने लौंडों को नहीं घूमना चाहिए रात बिरात. यहां की आदतें ठीक नहीं हैं जनाब". मैं हल्के से मुस्कुराया, मुक्तिबोध भी हंसे लेकिन यह उनकी हंसी नहीं थी. औपचारिक हंसी थी वह. वे फिर उदास हो गये. राजेश ने भी भांप लिया. आत्मदीप ने कारण पूछा तो मुक्तिबोध ने प्रश्न दागा- "तुम भोपाल में हो कुछ करते क्यों नहीं".
आत्मदीप ने बताया- "फुटकर व्यापार बचाओ जनसंघर्ष समिति बनी है। 22 जुलाई को रीवा, 28 जुलाई को जबलपुर और एक अगस्त को सागर में बैठकें हुईं. खेल बहुत बडा है, भारत में ही कुल पांच लाख करोड के फुटकर बाजार पर वालमार्ट और मेंटो के देसी संस्करणा रिलायंस, सुभिक्षा, एयरटेल नजर गडाए हुए है. यूं भी भारत में फुटकर बाजार की वृद्धि दर विश्व में सर्वाधिक (दस फीसदी) है". उन्होंने एक और भयानक सूचना दी कि भोपाल में तकरीबन तीस हजार सब्जी विक्रेता बेरोजगार हो गये हैं.
राजेश जी पर हिरन छाप का असर कम हो रहा था। वे अपने ही अंदाज में गरियाते हुए कह रहे थे शहर से थोडा हटके आबादी से बाहर खुली हरी पहाडी पर एक कालोनी है चौरासी बंगले. चौरासी बंगले हैं वहां, चौरासी बंगलों में हैं चौरासी बगीचे, चौरासी बंगलों में रहते हैं चौरासी परिवार. चौरासी हजार योनी पार करके आए हैं वे, चौरासी कारे हैं उन लोगों के पास. सारे शहर पर चलता है उनका रौब दाब. वे जिसकी चाहें खाट खडी कर सकते हैं -किसी भी वक्त.
मैंने कहा- "चांद मियां अबकी बार खाट खडी नहीं की है। इस बार तो ताबूत भी तैयार है". मुक्तिबोध अब तक चुप थे. वे आसमान की ओर सिर उठाये थे. कह रहे थे -अजी, यह चांदनी भी बडी मसखरी है. तिमंजिले की एक खिडकी में बिल्ली के एक सफेद धब्बे सी चमकती हुई/वह समेटकर हाथ पांव किसी की ताक में चुपचाप बैठी है/धीरे से उतरती है/ रास्तों पर चढती है/ छतों पर गैलरी में घूम और खपरैलों पर चढकर/ पेड की शाखों की सहायता से आंगन में उतरकर/ कमरों में हल्के पांव देखती है, खोजती है, जाने क्या?
राजेश जी उनके पीछे थे हम एक मैदान की ओर जा रहे थे। उमस बढ गई थी. आत्मदीप को जल्दी थी, वे वापस चल दिये. अब हम तीनों थे, मुक्तिबोध, राजेश और मैं. और चुप्पी. और उमस. और चांद टकटकी लगाए देख रहा था हमारी ओर. मुक्तिबोध की उदासी अब भी उनके चेहरे पर थी. उन्होंने फिर बीडी सुलगा ली थी. मैं सोच रहा था वे चांदनी को क्यों देख रहे हैं. यह हसरत की नजरें हैं या हिकारत की. क्या नये खुलते मॉल उन्हे चांदनी जैसे लग रहे हैं, जो धीरे धीरे उतर रहे हैं हमारे घरों के सबसे निचले हिस्सों में. बेआवाज. कितना अच्छा लग रहा है हमे बाजार का घर में आना. चांदनी की तरह, जो दबे पांव आई है बिल्ली की शक्ल में.
राजेश जी भी चुप थे, वे अपनी दाडी में उंगलियां फंसाए देख रहे थे आसमान की ओर. जिसकी उन्होंने सैर की थी हवाओं को चीरते, कुलांचे भरते हिरन की तबीयत पर सवार होकर बा-हैसियत एक शहंशाह. शायद वे याद कर रहे थे उन दिनों को जब सारे ग्रह, नक्षत्र तारे खडे हो जाते थे उनके सम्मान में और सप्तऋषि ऋचाएं गाते थे उनके लिए. वे उनकी विराट और बंजर बेरोजगारी के दिन थे. (जारी...)

August 8, 2007

कलाकारों को जनता के लिए संघर्ष करने की जरूरत

आधुनिक कला क्षेत्र में जिन झारखंडी प्रतिभाओं ने अपना लोहा मनवाया है, दिलीप टोप्पो उनमें से एक हैं। लोहरदगा के जोरी से बीएचयू होते हुए रांची तक के सफर में दिलीप ने हर जगह खुद को साबित किया। दिलीप का बीएचयू से स्कल्पचर में एमए करना जाहिर करता है कि उनका मिट्टी से गहरा जुडाव है, उनका मन मिट्टी में रमता है. पिता छटठु उरांव और मां सनिल उरांव की आंखों में पलते सपने को दिलीप ने अपनी जमीन पर ही साकार किया. यही कारण था कि बडे शहरों की दौड से दूर दिलीप अपने लोगों के बीच जीवन गढ रहे हैं. झारखंड के कई चौक चौराहों पर लगीं दिलीप के सधे हाथों से बनीं मूर्तियां इस जीवन का एक हिस्सा हैं. दिलीप की कलात्मक खूबसूरती और संघर्ष का एक पहलू झारखंड का पहला आदिवासी संस्कृति संग्रहालय है, जिसे अपनी जिद और जद्दोजहद के बीच उन्होंने साकार किया है.
संस्कृतिकर्मी एक्टिविस्ट अश्वनी पंकज ने झारखंड के पहले बहुभाषायी पाक्षिक जोहार दिसुम खबर के लिए दिलीप टोप्पो से नागपुरी में लंबी बातचीत की। उसके कुछ अंशों का अनुवाद।

दिलीप अपने बारे में कुछ बताएं?
-मेरी शुरुआती पढाई लोहरदगा में हुई। कला में रुचि थी सो बीएचयू में फाइन आर्ट में दाखिला ले लिया और वहां से 1995 में मास्टर डिग्री हासिल की। स्टोन कार्विंग (स्कल्पचर) में स्पेशलाइजेशन के साथ. मां-पिताजी जोरी में रहते हैं. बीएचयू से निकलने के बाद रांची में ही रह रहा हूं. पत्नी सुमलन टोप्पो भी आर्टिस्ट हैं. अनुकृति (बेटी) और सौंदर्य (बेटा), दो बच्चे हैं.
बडे संस्थानों से निकलकर ज्यादातर लोग महानगरों की ओर रुख करते हैं, आपने रांची की राह चुनी। क्यों ?
-स्टूडेंट लाइफ से समाज और राजनीति विषय मेरे मन के नजदीक रहे हैं। जब झारखंडी जनता अपने अस्तित्व की आखिरी लडाई लड रही हो। ऐसे में एक युवा-छात्र उससे कैसे दूर रह सकता है? मैं खुद उरांव आदिवासी समुदाय से हूं और बचपन से ही झारखंडी समाज के ऊपर होने वाले भेदभाव को देखता-झेलता रहा हूं. इसीलिए हम लोगों ने आदिवासी छात्र संघ का गठन किया और छात्रों को एकजुट करना शुरू किया--इस भेदभाव के विरोध में. पढाई के दौरान ही तय कर लिया था कि मुझे वापस रांची ही आना है और समाज के लिए काम करना है.
कला का क्षेत्र काफी महंगा है और झारखंड में यूं भी इसका बाजार नहीं है। तब आपका गुजारा किस तरह होता है?
-यदि गैर झारखंडी लोग यहां आकर जी सकते हैं, तो फिर हम झारखंडी लोग अपने राज्य में क्यों गुजर-बसर नहीं कर सकते? बात एकदम ठीक है कि कला का क्षेत्र काफी महंगा है और आम आदमी का इसके तंत्र में घुसना बेहद मुश्किल। लेकिन आज का झारखंडी मानस बहुत बदल गया है। यहां संभावना हैं, तभी तो पिछले 12 साल से मैं यहां सक्रिय हूं. जब मैंने बीएचयू छोडा था तब मेरे पास कुछ भी नहीं था. उन दिनों आदिवासी हॉस्टल में रहते हुए समाज और कला दोनों के लिए काम शुरू किया. आज कम से कम मेरा अपना स्टूडियो है और वर्क आर्डर भी मिलते ही हैं.
आदिवासी समाज अपनी प्रकृति में ही कलाकर है, फिर भी आधुनिक कला क्षेत्र में उनकी उपस्थिति कम है। ऐसा क्यों?
-यह जीवन दर्शन और विचार का फर्क है। आदिवासी समाज में कला जिंदगी की भीतर ही होती है, जबकि मुख्यधारा का समाज कला को स्टेटस और पैसे से जोडकर देखता है। हालांकि इधर के दिनों में यह द्वंद्व यहां भी दिखाई देता है, लेकिन मुख्यधारा के समाज में कला आज भी पैसा कमाने का साधन ही है. इस तरह से देखें तो झारखंडी समाज आज भी व्यावसायिक नहीं हुआ है.
झारखंड में जो लोग कला के क्षेत्र में सक्रिय हैं, उनमें आप खुद को कैसे अलग करके देखते हैं?
-झारखंड में दो जीवन दृष्टि हैं। एक बाहर से आए लोगों की और एक यहां के रहनेवालों की इन दोनों के जीवन और विचार में बुनियादी अंतर है। एक समाज प्रकृति के साथ चलने वाला है तो दूसरा महज उसका उपभोक्ता. यहां के कलाकर्म में भी यही दो जीवन दृष्टियां हैं. जहां तक मेरा सवाल है मैं स्वाभाविक रूप से झारखंडी जीवन दृष्टि का पक्षधर हूं.
नवगठित झारखंड में कला के लिए कैसा माहौल है?
-सरकारी स्तर पर इस दिशा में कई काम हो जरूर रहे हैं, जिनमें ज्यादातर कला और कलाकर्म को प्रोत्साहित करने के लिए हैं, लेकिन इनकी स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है। कलाकारों को झारखंडी जनता के करीब पहुंचकर उसके लिए संघर्ष करने की जरूरत है.

August 3, 2007

मां

हर मां एक जैसे होती है
भीतर से
और बेटे- बाहर से
इन दिनों 10 साल बाद फिर मां के साथ रह रहा हूं। पिछले महीने आईं थी, तब से उनका जी नहीं किया जाने का. मां का मन कभी कभी गांव की तरफ भागता है वहां के रिश्ते नाते उन्हें बुलाते होंगे, लेकिन दिल बेटे(मुझ)को छोडकर नहीं जा पाता. रात 1-2 बजे खाने पर इंतजार करती हैं और आंखें कमजोर होने के बावजूद आवाज से देख लेतीं हैं कि मैं कितना खा रहा हूं और कितना छोड रहा हूं. जब मां को छोडकर (1997 में) सफर पे निकला था तो सोचा था कि मैं कभी मुड न सकूंगा... अब सोचता हूं हर आदमी क्यों घर छोडते समय पीछे मुडकर देखता है...
सचिन