पूरी हकीकत पूरी फसाना-दो वीरेन डंगवाल की कविता "इलाहाबाद 1970" का एक अंश है…
विलुप्त. इस शब्द के ठीक ठीक उच्चारण और अर्थों से हमे जल्द और पूरी तरह परिचित हो जाना च…
ओशो को पढ रहा था। युद्ध और शांति-गीता का विश्लेषण. टीवी चल रही थी, बताया जा रहा है कि …
"मुझे अब कोई स्वीकार करता है और कोई नहीं भी। मुझे बहुत बुरा लगता है. मैं चाहती हू…
इन दिनों जब घर लौटते हुए अंधेरा अपने पूरे कालेपन के साथ चटचटा रहा होता है, मुझे तुम्हा…
पूरी हकीकत पूरा फसाना-एक कल रात तकरीबन साढे 11 बजे मैं और रूपेश आफिस से घर के लिए निक…
आधुनिक कला क्षेत्र में जिन झारखंडी प्रतिभाओं ने अपना लोहा मनवाया है, दिलीप टोप्पो उन…
हर मां एक जैसे होती है भीतर से और बेटे- बाहर से इन दिनों 10 साल बाद फिर मां के साथ रह…
कविता के शहरी भूगोल और ठेठ गंवई मिजाज में जो एक बडा फर्क है वह संदर्भों का है. शहरी कव…
अजय ब्रह्मात्मज फिल्म समीक्षक रोमांस कम, मस्ती ज्यादा और वह भी अल्हड़पन से लबरेज। '…
साहित्य
देश और प्रदेश के कई ख्यात रंगकर्मी, लेखक, कलाकार और संस्कृति कर्मी करेंगे भागीदारी …
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